देवझिरी झाबुआ का रहस्य : बारहमासी झिरी, गुप्त नर्मदा और शिव साधना की अनकही कथा

देवझिरी तीर्थ एक धार्मिक, ऐतिहासिक, पर्यटन और एक चमत्कारिक स्थल जहा भक्तो की सभी मनोकामनाए पूर्ण होती है..

 देवझिरी....जैसा की नाम से ही प्रतीत है की भगवान शिव (देव, एक देवता) और झिरी या एक बारहमासी वसंत ! वसंत एक कुंड में निर्मित किया गया है. एक समाधि बैसाख पूर्णिमा, जो अप्रैल के महीने में आयोजित की जाती है. देवझिरी तीर्थ में भगवान शिव का भव्य मंदिर चारो तरफ हरियाली युक्त द्रश्य और मंदिर प्रांगन में ही एक जल कुंड जहा पिछले कई वर्षो से नर्मदा नदी का जल अनवरत प्रवाहित हो रहा है ,, जल का निकास और मार्ग आज तक सभी भक्तो के लिए एक आश्चर्य का विषय है की यह जल कुंड यहाँ तक किस मार्ग से आ रहा है. 

1.भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक विशेषता

देवझिरी का शाब्दिक अर्थ है—"देवताओं की झिरी" (झिरी यानी छोटा झरना या जलधारा)। यह स्थान विंध्याचल की पहाड़ियों के निचले हिस्से में स्थित है। यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सूखे और पथरीले झाबुआ क्षेत्र में होने के बावजूद, यहाँ का जल स्रोत कभी नहीं सूखता। यहाँ एक प्राकृतिक गोमुख से जल की धारा निरंतर प्रवाहित होती है, जो नीचे बने एक प्राचीन कुंड में गिरती है। प्रकृति और आध्यात्म का यह मेल देवझिरी को इस क्षेत्र का सबसे मनोरम स्थान बनाता है। देवझिरी झाबुआ नगर से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर, इंदौर-अहमदाबाद मार्ग के समीप स्थित है।  देवझिरी झाबुआ शहर से लगभग 8 किलोमीटर उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित है, अहमदाबाद-इंदौर स्टेट हाईवे नं.22 के पास, और यह सुनार नदी के पश्चिमी किनारे पर बसा है।   यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध है। यहाँ की हरियाली, आसपास की पहाड़ियाँ और जलस्रोत इस स्थान को विशेष बनाते हैं। देवझिरी के समीप बहने वाली नदियाँ और प्राकृतिक झिरियाँ आदिवासी जीवन के लिए जल और जीवन दोनों का आधार रही हैं। देवझिरी झाबुआ नगर से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर, इंदौर-अहमदाबाद मार्ग के समीप स्थित है। यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध है। यहाँ की हरियाली, आसपास की पहाड़ियाँ और जलस्रोत इस स्थान को विशेष बनाते हैं। देवझिरी के समीप बहने वाली नदियाँ और प्राकृतिक झिरियाँ आदिवासी जीवन के लिए जल और जीवन दोनों का आधार रही हैं।  

devjhiri Shiv Mandir Jhabua Mela

स्थायी जलकुंड (अक्षय जलधारा): देवझिरी की सबसे बड़ी विशेषता इसका स्थायी जलकुंड है, जिसमें वर्ष भर पानी बना रहता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह जलकुंड कभी सूखता नहीं और इसमें स्नान करने से शारीरिक एवं मानसिक शुद्धि होती है। यह विंध्याचल की पहाड़ियों के निचले हिस्से में स्थित है और सूखे क्षेत्र में होने के बावजूद यहाँ एक प्राकृतिक गोमुख से जल की धारा निरंतर प्रवाहित होती है।  देवझिरी के बारे में सबसे अद्भुत बात इसकी अक्षय जलधारा है। वैज्ञानिकों और भू-गर्भ शास्त्रियों के लिए भी यह अध्ययन का विषय रहा है कि बिना किसी मोटर या बाहरी पंप के, एक ही वेग से पानी दशकों से कैसे बह रहा है। भक्तों के लिए यह "ईश्वरीय चमत्कार" है, जबकि वैज्ञानिकों के अनुसार यह पहाड़ियों के भीतर प्राकृतिक जल संचयन (Natural Aquifer) का परिणाम हो सकता है।

2. ऐतिहासिक और पौराणिक कथाएँ

देवझिरी का इतिहास सदियों पुराना है और इसके साथ कई महत्वपूर्ण लोककथाएं जुड़ी हुई हैं:

  • संत सिंगाजी और गुप्त नर्मदा की कथा

 प्राचीन काल में देवझिरी तीर्थ में किसी समय सिंघा  जी नाम के सन्यासी हुआ करते थे वे  प्रतिदिन यहाँ शिव जी का अभिषेक नर्मदा के जल से किया करते थे , देवझिरी से लगभग 150 किलोमीटर दूर कोटेश्वर से प्रतिदिन नर्मदा का जल लाना और उसी जल से शिव जी का अभिषेक करना , सिंघा जी की दिनचर्या थी , समय गुजरता गया , सिंघा  जी वृद्ध  हो गए मगर फिर भी उन्होने नर्मदा के जल से शिव जी का अभिषेक बंद नहीं किया , एक दिन सिंघा जी के तप  और साधना से माँ नर्मदा प्रसन हुई और सिंघा  जी को साक्षात् दर्शन देते  हुए  कहा की में वाही आउंगी जहा से तुम आते हो सिंघा  जी ने कहा की में कैसे मान  लू की आप आएँगी माँ नर्मदा ने कहा की तुम्हारा कमंडल यही छोड़ जाओ .   सिंघा   जी ने वैसा ही किया और अपना कमंडल वही  छोड़ कर देवझिरी आश्रम चले आये ,, अगले दिन जब बाबा सिंघा  जी की नींद खुली तो देवझिरी में एक छोटे जल स्त्रोत से निरंतर जल प्रवाहित हो रहा था ,,, साथ ही इस जल स्त्रोत के अन्दर सिंघा  जी का वह कमंडल जिसे वह नर्मदा नदी पर छोड़ कर आये थे वह भी मोजूद था .... इस प्रकार उस दिन से देवझिरी तीर्थ पर नर्मदा नदी का जल अनवरत प्रवाहित हो रहा है .. सिंघा  जी ने इसी देवझिरी तीर्थ पर समाधी ली .... आज भी प्रतिदिन इस नर्मदा नदी के जल से शिव जी का अभिषेक किया जाता है .....वर्ष 1934 में झाबुआ के महाराजा ने यहाँ एक कुंड  का निर्माण करवाया .....देवझिरी तीर्थ पर  झाबुआ जिले के ग्रामीणों की विशेष आस्था है ,, शहर में प्रति वर्ष निकलने वाली कावड  यात्रा में ग्रामीणों द्वारा कोटेश्वर महादेव से नर्मदा का जल ले जाकर देवझिरी तीर्थ में शिव जी का अभिषेक किया जाता है।  देवझिरी तीर्थ में भक्तो की मान्यता है की यहाँ  प्राचीन काल में एक शेर आया करता था , जो देवझिरी के कुंड  में स्नान करता और फिर शिव जी के दर्शन कर  चला जाता ....ग्रामीणों और भक्तो में यह मान्यता आज भी उसी रूप में है।

  • पांडव काल से संबंध

कुछ स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने भी इस क्षेत्र में समय बिताया था। यहाँ के प्राचीन शिवलिंग की स्थापना के पीछे पांडव कालीन इतिहास होने की बातें भी कही जाती हैं, हालांकि इसका कोई पुख्ता पुरातात्विक लिखित प्रमाण नहीं है, लेकिन जनश्रुतियों में यह धारणा आज भी जीवित है।

3.प्राचीन शिव मंदिर और धार्मिक महत्व

देवझिरी का केंद्र बिंदु यहाँ स्थित प्राचीन शिव मंदिर है। यह मंदिर अत्यंत सादा, किंतु गहन आस्था से परिपूर्ण है। माना जाता है कि यह शिवालय कई सौ वर्ष पुराना है और इसका निर्माण स्थानीय शासकों या समाज के धार्मिक पुरोहितों द्वारा कराया गया था। यहाँ भगवान शिव को जलाभिषेक और बेलपत्र अर्पण की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। कुंड के पवित्र जल से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है, जो इस स्थल की धार्मिक पहचान को और मजबूत करता है।

ग्रामीण जीवन में देवझिरी से जुड़े मेले, हाट और धार्मिक आयोजन सामाजिक संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम रहे हैं। लोगों के बीच प्रचलित है कि महाशिवरात्रि जैसे प्रमुख पर्वों पर भक्त 6 किलोमीटर तक पैदल यात्रा कर यहां पहुंचते हैं, नर्मदा कुंड में स्नान करते हैं और शिव के दर्शन करते हैं। इस दौरान धार्मिक उत्सव, पूजा-अर्चना, प्रसाद वितरण और भक्ति गीतों का आयोजन भी होता है।

5. वास्तुकला और मंदिर परिसर

देवझिरी मंदिर परिसर भारतीय मंदिर वास्तुकला और ग्रामीण सादगी का मिश्रण है।

  1. प्राचीन शिव मंदिर: मुख्य मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर की संरचना में उत्तर भारतीय नागर शैली का प्रभाव देखा जा सकता है। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग अत्यंत प्राचीन है।
  2. गोमुख और कुंड: मंदिर के ठीक सामने एक प्राचीन कुंड बना है। इस कुंड में एक पत्थर के 'गोमुख' से 24 घंटे और 365 दिन शुद्ध जल गिरता रहता है। इस जल का स्रोत आज भी एक रहस्य है क्योंकि यह पहाड़ियों के भीतर से आता है और कभी कम नहीं होता।
  3. समाधि स्थल: परिसर में कुछ प्राचीन साधुओं की समाधियाँ भी हैं, जो यह दर्शाती हैं कि यह स्थान प्राचीन काल से ही ऋषियों की तपस्थली रहा है।
  4. जैन तीर्थ: मुख्य शिव मंदिर के पास ही एक विशाल और आधुनिक जैन मंदिर (तीर्थ) का निर्माण भी किया गया है। यह स्थान अब हिंदू और जैन धर्म के सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बन गया है।

5. जनजातीय संस्कृति और देवझिरी

 झाबुआ जिला आदिवासी बहुल क्षेत्र है और देवझिरी का इतिहास भी भील और भिलाला जनजातियों से गहराई से जुड़ा है। आदिवासी समाज प्रकृति को देवता और जल को जीवन का आधार मानता है। यहाँ की झिरी को वे केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि देवता का वरदान मानते हैं। कहा जाता है कि एक समय इस क्षेत्र में भीषण सूखा पड़ा था, तब भगवान शिव की कृपा से यहाँ जलधारा प्रकट हुई और क्षेत्र को जीवनदान मिला।

  • आस्था का केंद्र: आदिवासी समाज इसे देवता का वरदान मानते हैं। भीषण सूखे के समय शिव कृपा से प्रकट हुई यह धारा उनके लिए जीवनदान है।
  • अस्थि विसर्जन का महत्व: भील समुदाय के लोग अपने पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन करने के लिए नर्मदा या गंगा जाने के बजाय देवझिरी को प्राथमिकता देते हैं। उनके लिए यहाँ का जल उतना ही पवित्र है जितना प्रयागराज या काशी का जल।
  • निशान और मन्नतें: जब भी क्षेत्र में कोई बड़ा धार्मिक आयोजन होता है, तो ग्रामीण अपने 'निशान' (धार्मिक ध्वज) लेकर यहाँ आते हैं और कुंड के जल से उन्हें स्नान कराते हैं। यहाँ मन्नत मांगने की परंपरा है कि यदि फसल अच्छी हुई या परिवार में खुशहाली आई, तो वे शिवजी को विशेष भेंट चढ़ाएंगे।

6.प्रमुख उत्सव और मेले

देवझिरी की रौनक त्यौहारों के समय देखते ही बनती है:

  • महाशिवरात्रि: महाशिवरात्रि के दिन यहाँ विशाल मेला लगता है। हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु यहाँ अभिषेक करने पहुँचते हैं। पूरा परिसर 'हर-हर महादेव' के जयकारों से गूंज उठता है।
  • वैशाख पूर्णिमा (चैत्र मेला): अप्रैल-मई के महीने में यहाँ एक बहुत बड़ा ग्रामीण मेला लगता है। यह मेला झाबुआ की व्यापारिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र होता है। यहाँ आदिवासी कला, संगीत और पारंपरिक नृत्य (भगोरिया जैसी झलकियाँ) देखने को मिलती हैं।
  • कावड़ यात्रा: प्रति वर्ष निकलने वाली कावड़ यात्रा में ग्रामीण कोटेश्वर महादेव से नर्मदा जल लाकर यहाँ अभिषेक करते हैं।
  • सावन सोमवार: सावन के महीने में यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य अपने चरम पर होता है। चारों तरफ हरियाली और निरंतर गिरता झरना भक्तों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है।

7. पर्यटन और विकास

पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग और स्थानीय प्रशासन ने देवझिरी के महत्व को समझते हुए यहाँ काफी विकास कार्य किए हैं।

  • पिकनिक स्पॉट: सुंदर पहाड़ियों और जल स्रोत के कारण यह स्थानीय लोगों के लिए एक पसंदीदा पिकनिक स्पॉट बन गया है।
  • सुविधाएँ: पर्यटकों के रुकने के लिए धर्मशालाएं, बैठने की व्यवस्था और गार्डन विकसित किए गए हैं।
  • पर्यावरण संरक्षण: यहाँ के जल स्रोत को प्रदूषित होने से बचाने के लिए भी कई प्रयास किए जा रहे हैं, क्योंकि यह जल न केवल धार्मिक बल्कि सिंचाई और पीने के काम भी आता है।

देवझिरी तीर्थ : झाबुआ का आध्यात्मिक चमत्कार, जहाँ आज भी अविरल बहती है गुप्त नर्मदा

हालाँकि देवझिरी का लिखित इतिहास सीमित है, लेकिन मौखिक परंपराएँ और लोकस्मृतियाँ इसे प्राचीन सिद्ध करती हैं। यह स्थल उस काल का साक्षी है जब जलस्रोतों को देवता के रूप में पूजा जाता था और धार्मिक स्थल प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का माध्यम बनते थे।  आज देवझिरी झाबुआ जिले के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। प्रशासन द्वारा यहाँ सुविधाएँ विकसित की गई हैं, लेकिन फिर भी इसकी प्राकृतिक और आध्यात्मिक सरलता आज भी बरकरार है। स्थानीय लोग देवझिरी को अपनी पहचान और विरासत मानते हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए यह स्थल आस्था, इतिहास और प्रकृति के संरक्षण का संदेश देता है। देवझिरी का लिखित ऐतिहासिक विवरण सीमित है, किंतु स्थानीय लोककथाओं और मौखिक परंपराओं के अनुसार यह स्थल प्राचीन काल से ही धार्मिक आस्था का केंद्र रहा है। माना जाता है कि यहाँ शिव उपासना सदियों से चली आ रही है और यह स्थान आदिवासी समाज के लिए भी विशेष महत्व रखता है। देवझिरी झाबुआ जिले का एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल है। प्राकृतिक वातावरण, शांति और धार्मिक आस्था के कारण यह स्थान स्थानीय पर्यटन मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

      झाबुआ जिले की गोद में बसा देवझिरी (Devjhiri Jhabua Shiv Mandir) केवल एक पर्यटन स्थल या मंदिर नहीं है, बल्कि यह पश्चिमी मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक चेतना, जनजातीय आस्था और प्राचीन भारतीय जल प्रबंधन कला का एक जीवंत प्रतीक है। झाबुआ मुख्यालय से मात्र 8 किलोमीटर दूर स्थित यह स्थान अपनी "गुप्त गंगा" और "अमर जलधारा" के लिए विख्यात है। देवझिरी केवल पत्थरों और पानी का मेल नहीं है, बल्कि यह झाबुआ के इतिहास की वह कड़ी है जो मनुष्य को प्रकृति और परमात्मा से जोड़ती है। जहाँ एक ओर संत सिंगाजी की कथाएँ इसे पवित्रता प्रदान करती हैं, वहीं दूसरी ओर यहाँ का बारहमासी झरना जीवन की निरंतरता का संदेश देता है। यदि कोई व्यक्ति झाबुआ की वास्तविक संस्कृति और शांति का अनुभव करना चाहता है, तो देवझिरी उसके लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। यह स्थान हमें सिखाता है कि कैसे सदियों से हमारी परंपराएं जल और प्रकृति के संरक्षण के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं।