झाबुआ इतिहास एवं महत्वपूर्ण जानकारी - Jhabua History

झाबुआ जिला मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग में स्थित है। यह गुजरात के पंचमहल , राजस्थान के बांसवाड़ा और मध्यप्रदेश के अलीराजपुर , धार जिलों से घिरा हुआ है।
इतिहास

         झाबुआ ब्रिटिश राज के मध्य भारत के एक राजसी राज्य की राजधानी भोपावर एजेंसी में था, राव भिरजी, मारवाड़ के राव जोधा के पांचवें बेटे, शासक परिवार का सबसे पहले ज्ञात पूर्वज थे। झाबुआ उनके वंश, कुंवर केशो दास या किशन दास ने 1584 में स्थापित की थी। उन्हें दिल्ली के मुगल सम्राट जहांगीर ने "राजा" का नाम बंगाल में एक सफल अभियान के लिए एक पुरस्कार के रूप में प्रदान किया था, उनके द्वारा भील प्रमुखों को दंड देने के लिए गुजरात के इंपीरियल वायसराय की हत्या कर दी थी। उसके शासक राठौड़ वंश के राजपूत थे. पूर्व में झाबुआ वनांचल क्षेत्र पांच भागों में विभक्त था, जिसमें सबसे बड़ा क्षेत्र भगौर रिसायत का था। सबसे पहले यहां पर भील जाति के राजाओं का साम्राज्य रहा तथा इनकी जाति का कसुमर राजा था। आज भी भील जाति के लोग इन्हें देवता के रूप में पूजते है। भील जाति में सबसे पहले डामोर जाति का अभ्योदय हुआ, बाद में अलग-अलग नामों से भील जाति के गोत्र बने। भील राज के पश्चात् भील राजा भोज के समय तक इस क्षेत्र पर राज करते रहे। इसके पश्चात् नायक (लबाना) जाति के राजाओं ने इस पूरे क्षेत्र पर राज किया एवं अपने सरदारों के नाम से विभिन्न ग्राम भी बसाएं। सन् 1584 में राजपूत सेनापति केशवदास ने बदनावर की ओर से आक्रमण कर इस क्षेत्र पर अपना आधिपत्य जमाया। जिसके बाद तब से आजादी तक राजपूत राजाओं का राज्य चलता रहा। वर्ष 1648 में राठौर वंश के तीसरे शासक माहसिंह ने बदनावर से राजधानी स्थानांतरित कर झाबुआ को राजधानी बनाया।
       ब्रिटिश शासन के दौरान राज्य केंद्रीय भारत एजेंसी की भोपावर एजेंसी के तहत था और 1927 में यह मालवा एजेंसी का हिस्सा बन गया। 1947 में भारत की आजादी के बाद, झाबुआ के आखिरी शासक ने 15 जून 1948 को भारतीय संघ में प्रवेश पर हस्ताक्षर किए, और झाबुआ नवनिर्मित मध्य भारत राज्य का हिस्सा बन गया, जो 1956 में मध्य प्रदेश में विलीन हो गया। इसका क्षेत्रफल, लगभग 6,793 किमी (4,220 वर्ग मील) है. मई 1948 में जब मध्‍यभारत बना था तब झाबुआ जिला अस्तित्‍व में आया। उस समय झाबुआ (Jhabua Tribes) जिला अलीराजपुर, जोबट, कठीवाडा, माठवार और पेटलावद परगने से मिलकर बना। झाबुआ ब्रिटिश राज्य की अवधि के दौरान भारत के रियासतों में से एक राज्य था। झाबुआ शहर में इसकी राजधानी थी रियासत के अधिकांश इलाके भील लोगों द्वारा बसे हुए थे, जो यहाँ की कुल आबादी का अधिकांश हिस्सा था.
अर्थव्यवस्था

मध्यप्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर, धार और रतलाम जिलों, गुजरात के दाहोद, राजस्थान के बांसवाड़ा, महाराष्ट्र के नंदुरबार एक चतुर्भुज बनाते हैं जो भील जनजाति का घर है जिसे 'भारत के बहादुर धनुष पुरुष' भी कहा जाता है। उत्तर में माही नदियों के प्रवाह के बीच भूमि का टुकड़ा और दक्षिण में नर्मदा इस जनजाति के सांस्कृतिक केंद्र का प्रतीक है; झाबुआ। 2008 में अलीराजपुर को एक नया जिला बनाने के लिए झाबुआ से अलग कर दिया गया। इन जिलों में करीब 20 लाख गांवों के साथ 1320 गांव हैं। इलाका पहाड़ी है। 1865 और 1878 के वन अधिनियम से पहले आदिवासियों के लिए वन आजीविका का मुख्य स्रोत थे, लेकिन अब बड़ी आबादी कृषि में शामिल है।
       झाबुआ जिला मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग में स्थित है। यह गुजरात के पंचमहल और बड़ौदा जिले, राजस्थान के बांसवाड़ा जिले और मध्य प्रदेश के अलीराजपुर , धार और रतलाम जिलों से घिरा हुआ है। नर्मदा नदी जिले की दक्षिणी सीमा बनाती है। इलाके पहाड़ी है, आमतौर पर झाबुआ "हिल्स स्थलाकृति" के रूप में जाना जाता है। इस झाबुआ पहाड़ी की भौगोलिक स्थिति में सबसे ऊंचे और सबसे कम अंक के बीच का अंतर 20 से 50 मीटर के बीच भिन्न होता है। लेकिन यह अंतर बढ़ता जा रहा है क्योंकि हम झाबुआ के दक्षिण की ओर बढ़ रहे हैं।
झाबुआ जिला
—  Jhabua District  —
राज्य मध्य प्रदेश्,  भारत
प्रशासनिक प्रभाग इंदौर
मुख्यालय झाबुआ
क्षेत्रफल 6,793 किमी (4,220 वर्ग मील)
जनसंख्या 1,025,048 (2011)
जनसंख्या घनत्व 285 /किमी (740 /वर्ग मील)
साक्षरता 81.07 per cent
लिंगानुपात 929
विकास 0.1451
लोकसभा क्षेत्र रतलाम
विधानसभा क्षेत्र झाबुआ, पेटलावद, थांदला
तहसील झाबुआ, थांदला, पेटलावद, मेघनगर, रानापुर, रामा
ग्राम संख्या 813
भाषा हिंदी, बरेली, राठवी, भिलाई
प्रमुख भगोरिया पर्व, नवरात्री चल समारोह, झाबुआ का राजा गणेशोत्सव
मुख्य आकर्षण पीपलखूंटा, समोई, तारखेडी, भाबरा, देवझिरी, लखमनी, हाथीपावा पहाड़ी, मालवई, आमखुट
नदियां माही, अनास
अक्षांश-देशांतर निर्देशांक22.77°N 74.6°E
 ऊँचाई (AMSL) 318 मीटर (1,043 फी॰)
समय मंडल:  आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
औसत वार्षिक वर्षण 800 मिमी
आधिकारिक जालस्थल
      अलीराजपुर प्रभाग जो झाबुआ के दक्षिण में स्थित है, ये इलाके लगभग पूरे पहाड़ी है और इन्हें संकीर्ण जंगलों से ढंके विंध्य पर्वत से अन्तर्निहित किया गया है। लेकिन झाबुआ का अधिकांश भाग किसी वन के बिना है क्योंकि भूमि और मिट्टी की कटाई की कम प्रजनन क्षमता के कारण यहां अस्तित्व एक कठिन समस्या बन गई है और कम बारिश अपराध को बढ़ावा दे रही है ।  जिले को पांच तहसीलों और छह समुदाय विकास खंडों में विभाजित किया गया है। झाबुआ जिले को मई 2008 में दो भागों में विभाजित किया गया, अलीराजपुर और झाबुआ। अलीराजपुर, जोबट , उदयगढ़, भाभरा, सोंडवा और कट्ठीवाड़ा नए अलीराजपुर जिले के 6 ब्लॉक हैं । झाबुआ जिले में अब झाबुआ, मेघनगर, रानापुर, रामा, थांदला और पेटलावद ब्लॉक शामिल हैं। 

जलवायु
       जिला अत्यधिक सूखा-प्रवण और अपशिष्टयुक्त भू-जल भूमि का हिस्सा है। जिला अल्ट्यूलेटेड, पहाड़ी इलाकों से भरा है; यह क्षेत्र काली मिट्टी से बहुत उथले गहराई और अनियमित वर्षा, उच्च तापमान के साथ ग्रस्त है। यह क्षेत्र एग्रोकलामीक क्षेत्र नं 12 के अंतर्गत आता है, जहां झाबुआ पहाड़ी क्षेत्र 0.68 मीटर है। (मध्य प्रदेश के भौगोलिक क्षेत्र का 1.5%)। जिले में तीन अलग-अलग उप-क्षेत्र हैं जैसे पेटलावाद (मालवा), झाबुआ (कम वर्षा) और कट्ठीवाड़ा (उच्च वर्षा) क्षेत्र। 2006 में पंचायती राज मंत्रालय ने झाबुआ को देश के 250 सबसे पिछड़े जिलों (कुल 640 में से ) में से एक नाम दिया। यह मध्य प्रदेश के 24 जिलों में से एक है, जो वर्तमान में पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि कार्यक्रम (बीआरजीएफ) से धन प्राप्त कर रहा है। 

संस्कृति
       दृढ़ और कड़ी मेहनत वाले जनजातियों - भील और भिलाल के निवास में, ज़िला सूखा-प्रवण और अपशिष्टयुक्त भू-जल क्षेत्र के रूप में विकसित है। हालांकि लगभग आधी जनसंख्या आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है, आदिवासी अब भी अपने पारंपरिक रंगीन उत्सवों में मशगूल होते हैं और "भगोरिया" जैसे अवसरों पर मजे करना जारी रखते हैं।
      महिलाओं द्वारा बांस के उत्पादों, गुड़िया, मनका-आभूषण और अन्य वस्तुओं सहित सुंदर जातीय वस्तुओं को बनाया गया  है, जो पूरे देश में जनजातीय संस्कृति का जीवंत उदाहरण है. पुरुषों के लिए "तीर-कामठी", धनुष और तीर, जो उनके प्रति प्रत्याशित और आत्मरक्षा का प्रतीक रहे हैं आदि हैं।. धनुष और तीर जिले के सभी हिस्सों में बने होते हैं। तीर कामठी उन्हें स्वयं की रक्षा के लिए इस्तेमाल करते हैं। कलात्मक धनुष और तीरों को आंतरिक सजावट के रूप में और उपहार वस्तु के रूप में उपयोग किया जाता है। चीनी, पारंपरिक रूप से ले जाने के लिए आदिवासी गुड़िया सिर पर मटका, या विवाह और अन्य शुभ समारोहों में उपहार स्वरुप दिए जाने हेतु , सुंदर रंगों से सुसज्जित होती है ।
      बंडी (आधा कोट) इस जिले के आदिवासियों का पारंपरिक सूट है। पूर्व प्रधान मंत्री श्री राजीव गांधी ने अपनी झाबुआ यात्रा के दौरान इसे बहुत पसंद किया था। आधुनिक युवक भी बंडी को बहुत पसंद करते हैं।
      गॉलसन माला (मनका का हार) पारंपरिक रूप से आदिवासी महिलाओं द्वारा पहना जाता है.वे बहुत खूबसूरत रंगों में आते हैं। अब मनका हार नवीनतम डिजाइनों और फैशंस को ध्यान में रखते हुए बना रहे हैं। निस्संदेह आज वे सभी महिलाओं की पहली पसंद हैं
      मिट्टी की कलाकृति इस परंपरागत कला रूप में घोड़ों, हाथियों आदि को आधुनिक डिज़ाइनों में बगीचे के (गमला) और अन्य उत्पादों पर बनाये जाते हैं। वे सजावट के लिए और उपहार वस्तुओं के रूप में उपयोग किया जाता है।
      पांजा दुररी (कालीन) यह एक विशेष और प्रतिष्ठित कला है जो स्थानीय आदिवासियों द्वारा उपयोग की जाती है। कालीन बहुत टिकाऊ और सस्ता भी है । यह भी विभिन्न डिजाइनों और रंगों के साथ जयपुर पैटर्न पर बना होता है।
      झाबुआ की पिथोरा कला को सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया है। इस कला में आदिवासी संस्कृति के अलावा हाथियों, घोड़ों और अन्य पालतू जानवरों की तस्वीरों और चित्रों की एक विस्तृत श्रृंखला है। पेमा फतिया और भूरीबाई  जो की एक आदिवासी कलाकार है उन्होंने इस कला के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता है।
      बोहनी (आदिवासी बास्केट) बांबू की मदद से आदिवासियों द्वारा बनाई गई टोकरी हैं यह बहुत आकर्षक दिखते हैं ये आदिवासी द्वारा खेत में कार्य हेतु बीज और अन्य घरेलू प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाता है। सजावटी प्रयोजनों और उपहार वस्तुओं के लिए छोटे सजावटी टोकरी का उपयोग किया जाता है।
      बांस कला विभिन्न प्रकार के टोकरियां, नाईट लैंप, कलम खण्ड और अन्य वस्तुए आदिवासियों द्वारा बनाई गई हैं। इन पर मनको का काम करके उन्हें और अधिक रंगीन और आकर्षक बना दिया जाता है। ये घर की सजावट, उपहार के प्रयोजनों और सामान्य उपयोग के लिए उपयोग किए जाने वाले विशेष खंड हैं।
      ब्लॉक प्रिंट्स जिले के आदिवासी कारीगरों द्वारा बनाए जाते हैं। वस्त्र मुद्रित करने के लिए विभिन्न डिजाइनों में विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक रंजक और ब्लॉकों का इस्तेमाल करते हैं। ब्लॉकों का प्रिंट घर के प्रयोजनों और अन्य दैनिक उपयोग के कपड़ों में उपयोग किया जाता है। ब्लॉक प्रिंट बहुत आकर्षक होते हैं, टिकाऊ है। इनका उपयोग मुख्या रूप से बेड कवर, टेबल कपड़े, पर्दे और पोशाक पहनने के रूप में उपयोग किया जाता है
      गडि़या शिल्‍प में यहां की विशिष्‍ट जनजातीय वेशभूषा का प्रयोग परम्‍परागत तरीके से किया जाता है। जिसमें स्‍त्री आकृति को घाघरा चोली और ओढ़नी पहनाया जाता है और पुरूष आकृति को धोती, शर्ट और पगड़ी पहनायी जाती है। प्रधानत: स्‍त्री को सिर पर टोकरी रखी जाती है और पुरूष आकृति को हाथ या कंधे पर कुल्‍हाड़ी या स्‍थानीय वाद्ययंत्र पकडे़ या बजाते हुए बनाया जाता है।

बाबा देव पीथोरा
यह एक परंपरागत कहानी है जिसे गांव के बुजुर्गों द्वारा बताया जा रहा है। वे कहते हैं कि एक समय था जब पूरा गांव अति सूखा  हो चूका था । फसल बिल्कुल भी बढ़ नहीं रही थी और हरियाली पूरी तरह ख़त्म हो गई थी। यह एक लंबे समय तक चलने वाला अकाल लग रहा था फिर ग्रामीणों ने इसे हल करने के लिए बडवा (शामन) को एक साथ मिलना तय किया। लोगों ने सबकुछ बडवा के समक्ष बताया और समाधान के लिए कहा, फिर बडवा ने ग्रामीणों से कहा कि भगवान "बाबा देव" नाखुश हैं, इसलिए उनके क्रोध से गांव में यह स्थिति हुई है।  लोगों ने इसका समाधान पूछा ... फिर उन्होंने सभी को कुछ अनुष्ठान करने के बाद बाबा देव को फिर से खुश करने का सुझाव दिया। उन्होंने हर परिवार से बाबा देव को प्रसन्न करने के लिए जानवरों और पेड़ों के चित्रों के साथ अपनी घर आँगन की दीवारें पेंट करने के लिए कहा। उन्होंने बड़वों के निर्देशों का पालन किया और उनके घरों की दीवारों पर पेंटिंग की और बाबा देव की भी पूजा की। इन सभी अनुष्ठानों के परिणाम में बाबा देव फिर से प्रसन्न हुए फलस्वरूप गांव में बारिश के साथ ही पेड़ फल , फसल लहलहाने लगी और पूरा गांव हरियाली से भरा हुआ। अब कोई भी अस्वस्थ नहीं था। 
       ऐसा माना जाता है कि उस घटना के बाद भील ने अपने परिवेश की समृद्धि और खुशहाली बनाए रखने के लिए बाबा देव को प्रसन्न करने के लिए एक अनुष्ठान के रूप में पेंटिंग शुरू कर दी । चित्रकारी उनके लिए एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान बन गई थी।
 गटाला 
यह भील समुदाय में एक बहुत ही महत्वपूर्ण परंपरा है, जिसमें हाल ही में मरने वाले व्यक्ति की स्मृति में एक समाधि का पत्थर बनाने का विधान है लेकिन यह एक वर्ष के भीतर किया जाना चाहिए। यह स्मारक पत्थर को "गटाला" कहा जाता है वे इस स्मारक पत्थर को बनाने के लिए नरम रॉक का उपयोग करते हैं। घोड़े पर सवार एक आदमी हमेशा गटाला पेंटिंग में दिखाया जाता है ऊपरी बाएं और दाएं पर सूरज और चंद्रमा की कलाकृती होती है। बड़वा (शमन) धार्मिक अनुष्ठान करवाने वाला प्रमुख होता है जो उस परिवार के सदस्य की याद में गटाला को फसल के क्षेत्र में स्थापित करने की तिथि का फैसला करता है जिसकी हाल ही में मृत्यु हो गई थी। फिर परिवार के सदस्यों द्वारा उक्त समाधी पत्थर से प्रार्थना की जाती है कि वह परिवार और पूरे गांव की देखभाल करे। इसके बाद परिवार के लोग गांव के लोगों को दावत के लिए आमंत्रित करते हैं और उन्हें महुआ से बना दारू प्रदान करते हैं। वे उस पूर्वजों के नाम पर पांच बकरियां का भी बलिदान करते थे।
गल-चूल पर्व / गल डेहरा
 जिले भर में होलीका दहन के दूसरे दिन ग्रामीण जन मनाते है गल बाबजी का त्यौहार (गल पर्व ). इस में एक रस्म में करीब 30 फीट ऊंचे गल (लकड़ी की चौकी पर ) पर कमर के बल झूलते हुए देवता के नाम के नारे लगाए जाते हैं तो एक ओर दहकते अंगारों पर चलकर श्रद्धालु अपनी मन्नत उतारते हैं। मन्नतधारी को कमर के बल रस्सी से बांधा जाता है। फिर मन्नत के अनुसार वह गल देवरा की जय करते हुए हवा में झूलते हुए 5 से 7 परिक्रमा करता है। मान्यता है कि मन्नत विवाहित व्यक्ति ही उतार सकता है। वही दूसरी परंपरा में ग्रामीणजन करीब तीन-चार फूट लंबे तथा एक फीट गहरे गड्ढ़े में दहकते हुए अंगारे के बीच में से माता के प्रकोप से बचने और अपनी मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु माता का स्मरण करते हुए जलती हुई आग में से निकल जाते हैं।
         मन्नतधारी सात दिनों तक उपवास रखने के साथ ही सातों दिन तक भगोरिया हाट में घूमते हैं। गल देवता घूमने के बाद ही मन्नत लेने वाला उपवास खोलता है। इसके पूर्व तक मन्नतधारी कुछ नहीं खाते। शरीर पर हल्दी लगाए, सफेद व लाल वस्त्रों में आंखों में काजल आंजे मन्नत धारी अपने परिवार के बीमार सदस्यों के ठीक होने के साथ ही अपनी परिवार की उन्नति को लेकर भी मन्नत मांगते हैं। जो पूरी होने पर गल डेहरा घूमकर गल देवता के समक्ष मन्नतधारी अपनी-अपनी मन्नतें उतारते हैं। गल डेहरा तक ग्रामवासी ढोल- मांदल बजाते नाचते-गाते पहुंचते हैं।
गाय गोहरी
यह एक और अनुष्ठान दीवाली के त्योहार के दौरान होता है। दिवाली के दूसरे दिन यह पर्व मनाया जाता है। खासतौर से धार, झाबुआ, आलीराजपुर, पेटलावद सहित अन्य आदिवासी अंचलों में यह रस्म कई दशकों से निभाई जा रही है। यहां लोग दूर-दूर से आते हैं और दु:ख, तकलीफ, लम्बी बीमारी, विवाह समस्या, संतान प्राप्त, आजीविका से लेकर सभी प्रकार की समस्याएं दूर करने के लिए गाय गौहरी की मन्नत मांगते हैं। अलसुबह भील अपने पशुओं को रंग, फूलों और कुछ सामान के साथ सजाने शुरू करते हैं ताकि उन्हें सुबह से शाम तक रस्म के लिए तैयार किया जा सके। समुदाय देवी सलार माता की पूजा की जाती है और उन्हें नारियल और दारू अर्पित की जाती है। 
        दिवाली के मौके पर मन्नतधारी गो माता के पैरों तले लेटकर अपनी मन्नतें उतारते हैं। पर्व का शुभारंभ गोबर से बनाए गए गोवर्धन पर्वत की पूजन कर किया जाता है। गाय गोहरी पर्व पर सुबह घरों पर गोवर्धन पूजा की जाती है। इसके बाद गायों को रंगबिरंगे रंगों से रंगकर उनके सींगों पर मोरपंख आदि बांध कर उन्हें सजाया जाता है। रंगबिरंगी सजी गायों के पीछे पटाखे छोड़ते हुए उन्हें दौड़ाया जाता है। पीछे-पीछे मवेशी पालक दौड़ते हैं। मंदिर के सामने गाय का गोबर बिछाया जाता है। जिसमें नए वस्त्र पहने मन्नतधारी पेट के बल लेट जाते हैं। पटाखों की आवाज से दौड़ती गाय मन्नतधारियों के उपर से गुजरती हैं। वैसे तो इसे मन्नत मांगने व उतारने वाला पर्व माना जाता है। लेकिन इस बारे में जानकारों की कुछ अलग राय भी है। उनका मानना है कि गाय गोहरी पर्व दरअसल ग्वालों द्वारा मनाया जाने वाला पर्व है। आदिवासी बोली में गाय गोहरी का अर्थ है गाय को चराने वाला। आदिवासी ग्वाले गाय के नीचे लेटकर उनसे इसलिए क्षमा मांगते हैं, क्योंकि पूरे साल उन्होंने चराने के दौरान मारा-पीटा जाता है। आदिवासी गाय को पूज्य मानते हैं। 
नवाई 
नवरात्री के पावन पर्व पर माताजी की घटस्थापना के साथ ही ग्रामीण अंचलों में देवी, देवताओं को पहली फसल अर्पण कर नवाई की जाती है। खेत में हल जोतने वाला किसान नवाई के पहले खेतों में लगी सब्जी के साथ ही फसल का भी उपयोग नहीं करता। भुट्टे सहित अन्य फसलों पहले देवी देवताओं को चढ़ाई जाती है।  किसान पहली फसल सबसे पहले सावन माता को चढ़ाते हैं। इसके बाद हाथीपावा, बजरंगबली, वगाजा देव, हालूण देव, शीतला माता, ओखा बाबजी, लालबाई माता, भवानी माता सहित चौदह बहनों को फसल चढ़ाते हैं। नवाई करने गए ग्रामीणों के साथ बड़ी संख्या में बच्चे भी शामिल होते हैं। जो चढ़ाई गई फसल उठाकर गांव की पहाड़ी या अन्य स्थान पर लेकर जाते हैं और भुट्टे आदि सेककर खाते हैं। नवाई करने के बाद घरों में भुट्टे के व्यंजन बनाने के साथ ही भिंडी बनाई जाती है। जिसका देवी-देवताओं और पुरखों को होम देने के बाद हल चलाने वाले के साथ ही परिवार वाले भी सेवन करने लगते हैं।
गढ़ पर्व 
प्रति वर्ष चैत्र कृष्ण पक्ष तेरस को झाबुआ के राजवाड़ा चौक पर आदिवासी संस्कृति एवं युवाओं के शौर्य प्रदर्शन का प्रतीक गढ़ पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है । करीब 40 फीट ऊँचाई वाले गढ़ की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है । राजाओं के जमाने से चले आ रहे इस पर्व में तेल एवं साबुन लगाकर लकड़ी के एक खंभे को खडा कर दिया जाता है और फिर उस पर ग्रामीणजन चढ़ने का प्रयास करते हैं। नगर में राजशाही के समय से ही यह परंपरा निभाई जा रही है। एक समय ग्रामीण गढ़ पर चढ़कर उसे जीतने की कोशिश करते थे और नीचे महिलाएं हाथों में लकडिय़ां लेकर गीत गाते हुए उन्हें मारती थी। जो युवा गढ़ जीत लेता था उसे नीचे से गुड़-चने की पोटली फेंककर दी जाती थी। 
      40 फीट के इस खंभे की व्यवस्था नगर पालिका द्वारा की जाती है। आदिवासी इसे बहड़िया का पेड़ कहते हैं। कांटेदार पेड़ में फल नहीं आते और तना सीधा-लंबा होता है। इस खंभे को तेल और साबुन लगाकर चिकना किया जाता है। बुजुर्ग बताते हैं पहले युवा सीधे इस खंभे से चढ़ते थे और कोई एकाध ही जीत पाता था। अब ताे कोई भी युवा सीधे खंभे से नहीं चढ़ पाता। कुछ कोशिश करते भी हैं लेकिन सफल नहीं हो पाते। युवा अब खंभे को टिकाने के लिए बांधी गई रस्सियों के सहारे चढ़ जाते हैं।
हलमा
हलमा विकास में सामुदायिक भागीदारी की एक परंपरा है। हम इसे इस तरह समझ सकते हैं, अगर समुदाय के एक व्यक्ति को परेशानी हो रही है और उसके सभी प्रयासों से बाहर निकलने में असमर्थ होने के बाद, हलमा के लिए बुलाया जाता है जिसका अर्थ है कि गांव में प्रत्येक परिवार के सदस्य उससे जुड़ जाएंगे और सामूहिक रूप से समस्या हल करेंगे। उदाहरण के लिए, एक किसान अपने घर का निर्माण अन्य परिवारों के सदस्यों के साथ करता  है। जब कार्य पूरा हो जाता है तो वे इसे एक दावत और नृत्य के पारंपरिक तरीके से मनाते हैं।
          जनजातीय गांवों के समग्र विकास के लिए काम कर रहे एक संगठन शिवगंगा के सामूहिक प्रयासों से  इस परंपरा को  स्थानीय जनजातियों को बड़े समुदाय की समस्याओं को हल करने में इसका इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया गया। अच्छी बारिश के बावजूद, इस क्षेत्र में पानी की समस्या है क्योंकि बारिश के दौरान पानी ढलानों से बह जाता है । अतः वे हलमा के द्वारा इस समस्या को हल कर रहे हैं। हर साल फरवरी और मार्च के महीनों में 450 गांवों से करीब 15000 आदिवासी वर्षा जल संरक्षण के लिए एक पहाड़ी पर समोच्च खाइयों को खोदने के लिए 2 दिनों के लिए एक साथ आते हैं। इसके बाद, लोग अपनी समस्याओं पर चर्चा करने और उन्हें हल करने के लिए अपने संबंधित गांवों में एक साथ मिलते हैं। वर्ष 2017 के बाद, हलमा द्वारा ग्रामीणों ने तालाब बनाये, हलमा करके अपने और आसपास के गांवों में बांधों को रोक दिया। पूरे देश के लगभग 500 मेजबान अतिथितियों ने 2018 में इस कार्यक्रम को देखने के लिए इस जगह का दौरा किया जिसमें पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नौकरशाहों, प्रोफेसरों और आईआईटी, आईआईएम और टीआईएसएस जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के छात्र शामिल हैं। यह कार्यक्रम सहानुभूतिपूर्ण और उपयुक्त विकास मॉडल का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन गया है जहां समुदाय आपसी समस्या की पहचान करने के लिए एक साथ हो जाते है, परिवर्तन का नेतृत्व करते है ।


मातावन 
प्रत्येक गांव में एक छोटा वन क्षेत्र होता है जिसे अपने गांव के देवता का स्थान कहा जाता है मातावन । यह गांव के जंगल को संरक्षित करने और व्यक्तिगत उपयोग के लिए लकड़ी का उपयोग करने का एक सामाजिक आदर्श है। पूरा समुदाय इसे संरक्षित और समृद्ध करने की ज़िम्मेदारी लेता है। वे सम्मान और कृतज्ञता के साथ देवता के लिए हर सीजन की अपनी पहली फसल भेट करते हैं।
फाड़ा 
यह एक सामाजिक जिम्मेदारी साझा करने वाले समुदाय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। जब भी, गांव या कसबे में सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है या त्यौहार मनाया जाता है, समुदाय के हर सदस्य व्यय और आय के अपने हिस्से का भुगतान किया जाता  है।

भगोरिया पर्व
        भगोरिया पर्व , भारत के शीर्ष 10 जनजातीय सांस्कृतिक त्यौहारों की सूची में एक जनजातीय त्यौहार है जो दुनिया भर के पर्यटकों का एक विशेष अनुगंम है । कुछ लोग इसे पारंपरिक प्रणय पर्व भी कहते है। कहा जाता है कि इन हाट बाजारों में आदिवासी युवक-युवती एक दूसरे को पसंद करते है और बाजार में एक दूसरे को गुलाल लगाते है। युवक पहले युवती को गुलाल लगाता है, यदि युवती की सहमती होती है, तो वह भी युवक को गुलाल लगाकर सहमती प्रकट करती है। यदि वह असहमत होती है,तो गुलाल को पौछ देती है। सहमती पर दोनो एक दूसरे के साथ भाग जाते है। गांव वाले भगोरिया हाट में बने प्रेम प्रसंग को विवाह सूत्र में बांधने के लिए दोनो परिवारो से बातचीत करते है और होलिका दहन हो जाने के बाद विवाह संपन्न करवाये जाते है। भगोरिया हाट-बाजारों में युवक-युवती बेहद सजधज कर अपने भावी जीवनसाथी को ढूँढने आते हैं। इनमें आपसी रजामंदी जाहिर करने का तरीका भी बेहद निराला होता है। इसी तरह सबसे पहले लड़का लड़की को पान खाने के लिए देता है। यदि लड़की पान खा ले तो हाँ समझी जाती है। 
भगोरिया फेस्टिवल खाना पीना
आदिवासी अभी भी कृषि में भारी कीटनाशकों और उर्वरकों का उपयोग करने से बहुत दूर हैं। उपज अभी भी प्राकृतिक और कार्बनिक है जो शहरी परिदृश्य में रहने वाले लोगों के लिए दुर्लभ स्वाद देता है।
      'दाल पान्या ' बहुत मशहूर पकवान है, आमतौर पर त्यौहारों और शुभ अवसरों पर बनाया जाता है। पान्या मक्की के आटे से तैयार किया जाता है और इसे पलाश के पेड़ की पत्तियों के बीच पकाया जाता है। मांसाहारी के लिए यह जगह दुर्लभ और अद्वितीय 'कड़कनाथ' नस्ल के मुर्गे का मुख्य स्त्रोत  है, जो इसके स्वाद और स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रसिद्ध है। दाल लकड़ी के ऊपर मिट्टी के कड़ाव एवं बर्तनो में तैयार किया जाता है और मक्की के आटे से बने पान्या के साथ परोसा जाता है, जो तृप्त अनुभव देता है। इस क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से उगाए जाने वाले बहुत सारे 'महुआ' और 'ताड़' पेड़ हैं जो ताजा तैयार महुआ ( ताड़ी ) प्रदान करते हैं। झाबुआ जिले में कट्ठीवाड़ा जंगलों को दुनिया भर में अपने बड़े आकार के और विभिन्न प्रकार के आमों के लिए जाना जाता है।

       जब हम झाबुआ (Jhabua Royal Family) को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्‍य में जब हम देखे तो झाबुआ जिले की स्‍थापना 1584 में केशवदास राठौर ने की थी। 1618 में इनकी जागीर मुगल सल्‍तनत से मिल गई, लेकिन 1642 में पुन: शाहजंहा ने केशवदास के भतीजे को राज्‍य सौंप दी।वर्तमान झाबुआ 15 वीं 16 वीं शताब्‍दी में तीन राज्‍यों से मिलकर बना था, अलीराजपुर, जोबट, और झाबुआ। 
    झाबुआ की स्‍थापना जहांगीर के शासन काल में श्री केशवदास राठौर ने की थी। जिन्‍होंने लगभग 23 वर्षों तक शासन किया इसके पश्‍चात करनसिंह, ने तीन साल राज्‍य किया। इसके बाद क्रमश: मानसिंह, कुशलसिंह, अनुपसिंह, बहादुर सिंह, भीमसिंह, प्रतापसिंह, रतनसिंह और अंत में गोपालसिंह ने शासन किया। सन् 1857 की क्रांति के समय गोपालसिंह केवल 17 वर्ष के थे। 1943 में अनेकों राजनीतिक परिवर्तनों के बाद ब्रिट्रिश सरकार द्वारा दिलीपसिंह को शासन की बागडोर पूर्णरूप से सौंप दी। 
       भाबरा जो एक समय झाबुआ जिले का हिस्सा था, जहां चंद्रशेखर आजाद, महान स्वतंत्रता संग्रामी ने अपने प्रारंभिक जीवन बिताया था जब उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी अलीराजपुर के तत्कालीन संपत्ति में सेवारत थे . लेकिन, अलीराजपुर जिला (जो एक समय झाबुआ जिले का हिस्सा था) को जब झाबुआ जिला से अलग एक अलग जिला बनाया गया तो भाबरा अलीराजपुर जिले का हिस्सा बन गया. 
यह जिला 21 अंश 55 20 उत्‍तरी अक्षांश और 23 14 52 उत्‍तरी अक्षांश के समानान्‍तर और 74 2 15 पूर्वी देशांश और 75 1 पूर्वी देशांश पर स्थित है। इसकी समुद्र तल से उंचाई 318 मीटर है। झाबुआ में 136 गाँव और 69 पंचायतें हैं। यह 317 मीटर ऊँचाई (ऊँचाई) में है। 2011 की जनगणना के रूप में, झाबुआ की आबादी 35,753 थी. पुरुषों और महिलाओं की जनसंख्या 48% से 52% का बीच थी . झाबुआ की 75% आबादी में औसत साक्षरता दर 59.5% थी , जो की राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी अधिक है: पुरुष साक्षरता दर 90.74% है, और महिला साक्षरता दर 81.16 % है. 2001 की जनगणना के रूप में झाबुआ में, जनसंख्या के 14% उम्र के 6 वर्ष से कम बच्चे है.

आबादी
      झाबुआ (Jhabua City) मध्‍यप्रदेश का सबसे छोटा जिला है। लेकिन मध्‍यप्रदेश का आदिवासी बहुल सबसे बड़ा जिला है। झाबुआ जिले का कुल भौगोलिक क्षेत्र 6,793 वर्ग किलो मीटर है। जो‍ कि प्रदेश का 1.53 प्रतिशत क्षेत्र है। 2011 में झाबुआ की आबादी 1,025,048 थी, जिसमें पुरुष और महिलाएं क्रमशः 515,023 और 510,025 थीं। 2001 की जनगणना में झाबुआ की आबादी 784,286 थी, जिसमें पुरुष 396,141 और शेष 388,145 महिलाएं थीं। झाबुआ जिला आबादी कुल महाराष्ट्र की आबादी का 1.41 प्रतिशत है। 2001 की जनगणना में, झाबुआ जिले के लिए यह आंकड़ा महाराष्ट्र आबादी का 1.30 प्रतिशत था।
2001 के अनुसार आबादी की तुलना में आबादी की तुलना में जनसंख्या में 30.70 प्रतिशत परिवर्तन हुआ था। भारत की पिछली जनगणना में, झाबुआ जिला ने 1991 की तुलना में जनसंख्या में 21.20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। कुल जनसंख्या में 565705 अनुसूचित जनजाति के लोग और 18259 अनुसूचित जाति की जनसंख्‍या है जो कि मध्‍यप्रदेश की कुल जनसंख्‍या का 1.6 प्रतिशत ही है।
       पुर्नगठित मध्‍यप्रदेश में लगभग 96.27 लाख जनजातीय आबादी निवास करती है। यहां गौंड और भील जनजातियों की आबादी अधिक है।  झाबुआ जिले की आबादी एक देश साइप्रस की आबादी या अमेरिका के राज्य मोंटाना के बराबर है । यह भारत में 440 वीं रैंकिंग देता है (कुल 640 में से)
आदिवासियों का जनजातीय जीवन बहुत सरल और सहज होता है, उनकी ज़रूरतें बहुत सीमित होती हैं उनका घर "फलिया " अर्थात (छोटा गांव) से है, जो एक गांव की बहुत ही महत्वपूर्ण इकाई है। कई "फलीयो" से मिलकर एक गांव का निर्माण होता है, ये "फलीया" 5 किमी के क्षेत्र में होते है , और लगभग 25 से 50 घर एक "फलीया" में आम तौर एक गांव में होते हैं , इस प्रकार प्रत्येक गांव में सामान्यतः 10 फलिये होते है , लेकिन कुछ जगह इसे 20 "फलयो" तक बढ़ाया जा सकता है। 
         आम तौर पर, आदिवासियों का घर बांस और गोबर एवं मिटटी से निर्मित होता है, लेकिन अब आधुनिकता और सरकारी योजनाओं के कारण वे सीमेंट- कंक्रीट हाउस और गांवों में "हवेली" का निर्माण कर रहे हैं। 
      इस जनजातीय संस्कृति में पुरुष और महिला की शादी "पंचायत" द्वारा पारस्परिक सहमति से तय की जाती है। जहां दूल्हे की तरफ से दुल्हन के परिवार को धनराशि एवं जेवर आदि देना अनिवार्य है, यह एक प्रथा है जिसे "दापा" भी कहा जाता है। इस सौदे के अनुसार शादी करने के बाद 1000 से 50000 नकद, चांदी के आभूषण, बकरियां और अनाज शामिल किया जाता है। 
        व्यक्तिगत और पारिवारिक किसी भी आयोजन पर बकरे की बली देना अनिवार्य है, साथ ही साथ नृत्य और सारी रात गाना और शराब पीते हैं। 
      आदिवासी लोग जन्म से कलाकार होते हैं। वे स्वयं अपना घर, खाट, बिस्तर, कोठी आदि बनाने में सक्षम हैं। फिर भी आदिवासी में कुछ विशेष कला हैं, जिन्हें "लोक कला" के रूप में जाना जाता है, कुछ विशेष कला "पिथोरा" कला, बांस कला, ऊनी बुनाई वाली कला, लकड़ी कला, मिट्टी की कला आदि है। इसमें "पिथोरा" कला सबसे महत्वपूर्ण हैं, इस कला में आदिवासी लोग घर की दीवार पर पेंटिंग करते हैं इस चित्र में वे जंगली जानवरों और देवी देवताओ की तस्वीर आदि बनाते है । चित्रों के पीछे का मकसद यह है कि भगवान हमारी रक्षा करे और हमें समृद्धि प्रदान करे। बांस कला द्वारा बांसुरी, टोकरी, झाड़ू, आदि बनाते हैं।
      अलीराजपुर जिले में भगोरिया पर्व वालपुर, सोंडवा, छकतला और नानपुर  का बहुत प्रसिद्ध हैं। जिले के बखतगढ़ गांव में गुजरात बॉर्डर से सटा होने के कारन भगोरिया पर्व में "गेर" बहुत खास है।
      झाबुआ मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग में स्थित मुख्य रूप से आदिवासी जिला है। झाबुआ में "राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र" का जिला केंद्र, कलेक्ट्रेट भवन में वर्ष 1989 में सभी सरकारों को सूचना विज्ञान सेवाओं का विस्तार करने के लिए स्थापित किया गया था।

झाबुआ रियासत हेतु जारी कोर्ट फीस

      इसकी स्थापना के बाद से, एनआईसी जिला केंद्र झाबुआ जिला स्तर पर उचित एमआईएस/ डाटाबेस के डिजाइन, विकास और कार्यान्वयन में आवश्यक सहायता सेवाएं प्रदान कर रहा है, प्रशिक्षण, इलेक्ट्रॉनिक संचार में सहायता और विभिन्न आंकड़ों के प्रसंस्करण आदि। एनआईसी जिला केंद्र झाबुआ ने जिले में विभिन्न प्रयोक्ता विभागों के कई कर्मचारियों को प्रशिक्षण, केंद्र सरकार को आवश्यक समर्थन और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है.
      झाबुआ मुख्य रूप से आदिवासी जिला है, और उच्च शिक्षा निरक्षरता और गरीबी से ग्रस्त है। आबादी का लगभग आधा भाग गरीबी रेखा से नीचे रहता है भील और भिलाला जिले के आंतरिक इलाकों में निवास करते हैं। यहां लचीला और असमान सतह श्रेष्ट कृषि उत्पादकता हेतु श्रेयस्कर नहीं है । जिला हस्तियां उद्योग के लिए प्रसिद्ध है जो स्थानीय निवासियों के लिए आय का प्रमुख स्रोत है। जिले में कई उद्योग भी हैं। जिला में कई खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं.
          2011 में, कुल 471 परिवार मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में फुटपाथ पर या किसी छत के बिना रहते थे। 2011 की जनगणना के समय में छत के बिना रहने वाले सभी लोगों की कुल जनसंख्या झाबुआ जिले की कुल आबादी का लगभग 0.21% है।
          2011 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या के कुल 8.97 प्रतिशत लोग शहरी क्षेत्रों में रहते हैं। कुल 91,983 लोग शहरी क्षेत्रों में रहते हैं, जिनमें से पुरुष 47,555 और महिला 44,428 हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार झाबुआ जिले के शहरी क्षेत्र में लिंग अनुपात 934 है। इसी तरह झाबुआ जिले में बाल लिंग अनुपात 2011 की जनगणना में 921 थी। शहरी क्षेत्र में बाल जनसंख्या (0-6) 13,115 थी, जिसमें से पुरुष और महिलाएं 6,826 और 6,289 थीं। झाबुआ जिले की यह जनसंख्या आबादी कुल शहरी आबादी का 14.35% है। झाबुआ जिले में औसत साक्षरता दर 2011 की जनगणना के अनुसार 83.49% है जिसमें पुरुष और महिलाएं क्रमशः 89.86% और 76.69% साक्षर हैं। वास्तविक संख्या में 65,850 लोग शहरी क्षेत्र में साक्षर हैं, जिनमें से पुरुष और महिलाएं क्रमशः 36,601 और 29,249 हैं। श्रमिक बल की भागीदारी दर 44.43% है। जिले में कृषि क्षेत्र से प्रति व्यक्ति आय 31,316 रुपये है। वर्ष 2014 में जिले में अपराध दर 291.69 है। कुल खेती क्षेत्र हेक्टेयर में 2,55,431 है और वन क्षेत्रफल 937 वर्ग किमी (2015) है.
Jhabua Flag
          2011 की जनगणना के अनुसार झाबुआ जिलों की 91.03% जनसंख्या गांवों के ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुल झाबुआ जनसंख्या जनसंख्या 933,065 है, जिसमें से पुरुष और महिलाएं क्रमशः 467,468 और 465,597 हैं। झाबुआ जिले के ग्रामीण इलाकों में, लिंग अनुपात 996 महिला प्रति 1000 पुरुष हैं। यदि झाबुआ जिले का बाल लिंग अनुपात आंकड़ा माना जाता है, तो आंकड़ा प्रति 1000 लड़कों के लिए 944 लड़कियां हैं। 0-6 आयु वर्ग के बाल जनसंख्या 198,754 ग्रामीण क्षेत्रों में हैं जिनमें से पुरुष 102,214 और महिलाएं 96,540 थीं। बच्चे की आबादी झाबुआ जिले की कुल ग्रामीण आबादी का 21.87% है। झाबुआ जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षरता दर जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार 38.98% है। लिंगानुसार, पुरुष और महिला साक्षरता क्रमशः 48.73 और 29.33 प्रतिशत थी। कुल 286,231 लोग साक्षर थे, जिनमें से पुरुष और महिला क्रमशः 177,981 और 108,250 थी।

झाबुआ का “गर्व” और “काला सोना” 
“कड़कनाथ मुर्गा”…नाम भले ही अजीब सा हो, लेकिन झाबुआ और अलीराजपुर जिले में पाई जाने वाली मुर्गे की यह प्रजाति यहाँ के आदिवासियों और जनजातियों में बहुत लोकप्रिय है । इसकी त्वचा और पंखों से लेकर मांस ,रक्त तक का रंग काला होता है.जो भी बाहरी लोग और सरकारी अफ़सर यहाँ आते हैं, उनके लिये “कड़कनाथ” एक आकर्षण जरूर होता है । इसे झाबुआ का “गर्व” और “काला सोना” भी कहा जाता है । 
        जनजातीय लोगों में इस मुर्गे को ज्यादातर “बलि” के लिये पाला जाता है, दीपावली के बाद, त्योहार आदि पर देवी को बलि चढाने के लिये इसका उपयोग किया जाता है । इसकी खासियत यह है कि इसका खून और माँस काले रंग का होता है । लेकिन यह मुर्गा दरअसल अपने स्वाद और औषधीय गुणों के लिये अधिक मशहूर है । कड़कनाथ भारत का एकमात्र काले माँस वाला चिकन है। 
       झाबुआ में इसका प्रचलित नाम है “कालामासी” । देश की जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री ने झाबुआ की पारंपरिक प्रजाति के कड़कनाथ मुर्गे को लेकर सूबे के दावे पर मंजूरी की मुहर लगा दी है. करीब साढ़े छह साल की लंबी जद्दोजहद के बाद विगत 30 जुलाई 2018 को झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस के नाम भौगोलिक पहचान (जीआई) का चिह्न पंजीकृत किया गया है. जीआई चिन्ह के कारण कड़कनाथ चिकन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबारी पहचान मिलेगी एवं इसके निर्यात के रास्ते खुल जायेंगे. जीआई रजिस्ट्रेशन के बाद विभागीय राज्यमंत्री विश्वास सारंग ने कड़कनाथ मुर्गे के पालन और खरीद-फरोख्त हेतु मोबाइल एप लांच किया, जिसे गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है.

झाबुआ डेव्लपमेंट कम्युनिकेशन प्रोजेक्ट (JDCP)

झाबुआ विकास संचार परियोजना (JDCP) ग्रामीण अनपढ़ आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए इसरो द्वारा संचालित उपग्रह संचार और विकास प्रयासों के लिए कार्यक्रम सहायता संचार प्रदान करती है। यह परियोजना झाबुआ में स्थित है, जो मुख्यतः मध्य भारत में एक बड़ी जनजातीय आबादी वाला ग्रामीण क्षेत्र है। झाबुआ विकास संचार परियोजना (JDCP) विन्यास SITE और खेड़ा संचार परियोजना (KCP) के अनुभवों से विकसित हुआ है।           झाबुआ विकास संचार परियोजना का उद्देश्य भारत के दूरस्थ और देहाती क्षेत्रों में विकास और शिक्षा का समर्थन करने के लिए एक संवादात्मक उपग्रह-आधारित प्रसारण नेटवर्क के उपयोग के साथ प्रयोग करना है। झाबुआ के कई गांवों में सैटेलाइट डिश, टीवी सेट, वीसीआर और अन्य उपकरण जैसे कुछ 150 प्रत्यक्ष-रिसेप्शन सिस्टम लगाए गए हैं, जो उपग्रह के माध्यम से अपग्रेड किए गए DECU के अहमदाबाद स्टूडियो से हर शाम दो घंटे के लिए टेलीविजन प्रसारण प्राप्त करते हैं। इसके अलावा, झाबुआ जिले के प्रत्येक ब्लॉक मुख्यालय में 12 टॉकबैक टर्मिनल स्थापित किए गए हैं, जिसके माध्यम से ग्राम कार्यकर्त्ता सवाल पूछते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं, और प्रगति पर रिपोर्ट करते हैं।

झाबुआ शहर प्रमुख जानकारी 
झाबुआ शहर को 18 वार्डों में विभाजित किया गया है, जिसके लिए हर 5 साल में चुनाव आयोजित किए जाते हैं। झाबुआ नगरपालिका की जनसंख्या 35,753 है, जिसमें से 18,375 पुरुष हैं जबकि 17,378 महिलाएं जनगणना भारत 2011 द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार हैं।
      0-6 की उम्र वाले बच्चों की जनसंख्या 4811 है, जो झाबुआ की कुल आबादी का 13.46% है। झाबुआ नगर पालिका में महिला लिंग अनुपात 946 है जो की राज्य की औसत संख्या के मुकाबले 931 है। इसके अलावा झाबुआ में बाल लिंग अनुपात 921 के आसपास है, जो की मध्य प्रदेश राज्य की औसत अनुपात के अनुसार 918 है। झाबुआ शहर की साक्षरता दर 86.08% है जो की  राज्य की औसत साक्षरता दर 69.32% से  अधिक है। झाबुआ में, पुरुष साक्षरता लगभग 90.74% है जबकि महिला साक्षरता दर 81.16% है। झाबुआ नगर पालिका में 7,270 घरों पर कुल प्रशासनिक अधिकार है जिसमें पानी और सीवरेज जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं। यह नगर पालिका सीमाओं के भीतर सड़कों का निर्माण करने और इसके अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले भागोपर कर लगाने का भी अधिकार है।

विवरण 2011 2001
वास्तविक जनसंख्या 1,025,048 784,286
पुरुष 515,023 396,141
महिला 510,025 388,145
जनसंख्या वृद्धि 30.70% 21.20%
एरिया स्क्वायर किमी 3,600 3,600
घनत्व / km2 285 218
मध्य प्रदेश की आबादी का अनुपात 1.41% 1.30%
लिंग अनुपात (प्रति 1000) 990 980
बाल लिंग अनुपात (0-6 आयु) 943 967
औसत साक्षरता 43.30 41.37
पुरुष साक्षरता 52.85 53.95
महिला साक्षरता 33.77 28.58
कुल बाल जनसंख्या (0-6 आयु) 211,869 177,931
पुरुष जनसंख्या (0-6 आयु) 109,040 90,441
महिला जनसंख्या (0-6 आयु) 102,829 87,490
साक्षर 352,081 250,847
पुरुष साक्षरता 214,582 164,916
महिला साक्षरता 137,499 85,931
बाल अनुपात (0-6 आयु) 20.67% 22.69%
लड़कों का अनुपात (0-6 आयु) 21.17% 22.83%
लड़कियों का अनुपात (0-6 आयु) 20.16% 22.54%
जातिवार जनसँख्या आंकड़े 
विवरण कुल प्रतिशत
हिंदू 960,925 93.74%
मुसलमान 15,733 1.53%
ईसाई 38,423 3.75%
सिख 141 0.01%
बौद्ध 65 0.01%
जैन 8871 0.87%
अन्य लोग 388 0.04%
* Not Stated 502 0.05%
झाबुआ , मध्यप्रदेश एवं भारत की आज की जनसंख्या आंकड़े यहाँ देखे क्लिक करे 

      कहा जाता है कि झाबुआ जिला भीलों का जिला है जहां 80 प्रतिशत भीलों का निवास है। जनसंख्‍या की दृष्टि से भील को भारत वर्ष की सबसे बड़ी जनजाति माना जा सकता है। सभी उप जातियों सहित भील जनजाति की कुल जनसंख्‍या लगभग 60 लाख है प्रशासनिक व्‍यवस्‍था के अर्न्‍तगत जिले को 5 राजस्‍व अनुभागों, 6 तहसीलों व 6 विकास खण्‍डों में बांटा गया है। जिले में 612 ग्राम पंचायतें व 813 आबाद ग्राम है 
झाबुआ जिले में जो छः तहसील हैं वे इस प्रकार है-- 
  1. झाबुआ 
  2. रानापुर 
  3. मेघनगर 
  4. पेटलावद 
  5. थांदला 
  6. रामा 
     जिले के दक्षिणी एवं उत्‍तरी भाग पर नर्मदा और माही नदी बहती है। नर्मदा जिले की सबसे बड़ी नदी है। यह पूर्व से पश्चिम की और जिले के दक्षिणी किनारे से बहती है। जिले की हथनी नदी नर्मदा की मुख्‍य सहायक नदी है। झाबुआ जिला कट्ठीवाड़ा और अन्य क्षेत्र को छोड़कर वनस्पति से रहित है और लहरदार, पहाड़ी क्षेत्रों से भरा है. इस क्षेत्र में दो जनजातियों भील और भीलाला मुख्यतः निवासरत है.

      झाबुआ शहर पर जोधा राठौर राजवंशी की हुकूमत ई .पु 1584 से शुरू हुई. झाबुआ शहर के प्रथम महाराजा व जोधा राठौर राजवंश के प्रथम रघुवंशी महाराजा केशवदासजी थे जिन्होंने ई. पु 1584 से 1607 तक साम्राज्य संभाला . इस प्रकार समय के साथ झाबुआ शहर पर जोधा राठौर राजवंश की राज गद्दी पर राजवंश के विभिन महाराजा आसीन हुए व झाबुआ शहर की बागडोर संभाली. झाबुआ शहर के २० वे महाराजा अजीत सिंह जी वर्ष 1965 से 2002 तक राजगद्दी पर आसीत रहे व वर्ष २००२ में उनके देहावसान के पश्चात् झाबुआ शहर के २१ वे महाराजा के रूप में नरेन्द्रसिंह जी का राजतिलक व राज्याभिषेक किया गया . राजतिलक राजवंशी राजपुरोहित श्री हरिओम सिंह जी राजपुरोहित द्वारा अपने रक्त से किया गया . तत्पश्चात महाराजा नरेन्द्र सिंह जी को राजगद्दी पर आसीन किया गया .


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अंतिम संशोधन : मार्च 5, 2021 01:23 PM