झाबुआ भगोरिया उत्सव: क्यों खींचे चले आते हैं सात समंदर पार से विदेशी पर्यटक?- Jhabua Bhagoriya Mela, Tribe Festival

मध्य प्रदेश के झाबुआ और आलीराजपुर में आयोजित 'भगोरिया उत्सव' अब एक वैश्विक आकर्षण बन चुका है। जानिए क्यों विदेशी सैलानी इस आदिवासी संस्कृति के मुरीद ह
झाबुआ एवं अलीराजपुर जिले का भगोरिया पर्व प्रदेश को संस्कृति के क्षेत्र में विश्व मानचित्र में विशेष स्थान दिलाता है। ग्रीष्म ऋतु की दस्तक के एहसास के साथ आम के मौरो की खुशबू से सराबोर मदमस्त फागुनी हवाओं के झोको के साथ आदिवासियों का लोकप्रिय पर्व भगौरिया होलिका दहन होने के सात दिन पूर्व से प्रारंभ होता है। आदिवासी अंचलों में भगोरिया हाट प्रारंभ होने के सात दिन पूर्व से जो बाजार लगते है, उन्हें आदिवासी अंचल में त्यौहारिया हाट अथवा सरोडिया हाट कहते है। भगोरिया पर्व आदिवासियों का महत्वपूर्ण त्यौहार है। इसलिए भगौरिया हाट प्रारंभ होने से पूर्व के साप्ताहिक हाट में इस त्योहार को मनाने के लिए अंचल के आदिवासी ढोल, मांदल, बांसुरी, कपडे,गहने एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं की खरीददारी करते है। अर्थात साज-सज्जा का सामान खरीदते है। इसीलिए इन्हें त्यौहारिया हाट कहा जाता है। भगोरिया पर्व अब केवल स्थानीय उत्सव नहीं रहा, बल्कि यह विदेशी पर्यटकों के लिए भारत की आदिवासी संस्कृति का जीवंत अनुभव बन चुका है। झाबुआ और अलीराजपुर में आयोजित इस पर्व में पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-मांदल की धुन, लोक नृत्य और हाट बाजार विदेशी सैलानियों को आकर्षित करते हैं। यूरोप, अमेरिका और एशिया से आने वाले पर्यटक भगोरिया को “Live Tribal Festival” के रूप में देखते हैं। मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग भी इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट करता है। आज के आधुनिक दौर में भी भगोरिया ने अपनी ऐतिहासिक आत्मा को जीवित रखा है। ढोल की वही थाप और मांदल की वही गूँज आज भी हज़ारों साल पुराने उस इतिहास को जीवंत कर देती है।
झाबुआ भगोरिया उत्सव: क्यों खींचे चले आते हैं सात समंदर पार से विदेशी पर्यटक?- Jhabua Bhagoriya Mela, Tribe Festival
क्या है भोगर्या अथवा भगोरिया पर्व

क्या है भगोरिया

Jhabua Bhaoria
               कुछ लोग इसे पारंपरिक प्रणय पर्व भी कहते है। कहा जाता है कि इन हाट बाजारों में आदिवासी युवक-युवती एक दूसरे को पसंद करते है और बाजार में एक दूसरे को गुलाल लगाते है। युवक पहले युवती को गुलाल लगाता है, यदि युवती की सहमती होती है, तो वह भी युवक को गुलाल लगाकर सहमती प्रकट करती है। यदि वह असहमत होती है,तो गुलाल को पौछ देती है। सहमती पर दोनो एक दूसरे के साथ भाग जाते है। गांव वाले भगोरिया हाट में बने प्रेम प्रसंग को विवाह सूत्र में बांधने के लिए दोनो परिवारो से बातचीत करते है और होलिका दहन हो जाने के बाद विवाह संपन्न करवाये जाते है। भगोरिया हाट-बाजारों में युवक-युवती बेहद सजधज कर अपने भावी जीवनसाथी को ढूँढने आते हैं। इनमें आपसी रजामंदी जाहिर करने का तरीका भी बेहद निराला होता है। इसी तरह सबसे पहले लड़का लड़की को पान खाने के लिए देता है। यदि लड़की पान खा ले तो हाँ समझी जाती है।  
भगोरिया इतिहास

भगोरिया का इतिहास

           भगोरिया कब औऱ क्यों शुरू हुआ। इस बारे में लोगों में एकमत नहीं है। सबसे अधिक प्रचलित मान्यता यह है कि भगोरिया की शुरुआत धार के राजा भोज के समय (1010-1055 ईस्वी) में हुई थी। भगोरिया पर लिखी कुछ किताबों के अनुसार भगोरिया राजा भोज के समय लगने वाले हाटों को कहा जाता था। इस समय दो भील राजाओं कासूमार औऱ बालून ने अपनी राजधानी भगोर में विशाल मेले औऱ हाट का आयोजन करना शुरू किया। धीरे-धीरे आस-पास के भील राजाओं ने भी इन्ही का अनुसरण करना शुरू किया जिससे हाट और मेलों को भगोरिया कहना शुरू हुआ। वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों का मानना है क्योंकि इन मेलों में युवक-युवतियाँ अपनी मर्जी से भागकर शादी करते हैं इसलिए इसे भगोरिया कहा जाता है। आदिवासी समाज की लोक कथाओं के अनुसार, इस पर्व का नाम 'भंगोरा देव' के नाम पर पड़ा है। भंगोरा देव को आदिवासियों का रक्षक और खुशहाली का देवता माना जाता है। होली से पहले उनकी पूजा कर अच्छी फसल के लिए आभार व्यक्त किया जाता है और आने वाले वर्ष के लिए सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। प्राचीन काल में आदिवासी गाँव दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों में बसे होते थे। साल भर लोग खेती और काम में व्यस्त रहते थे। भगोरिया हाट को एक ऐसे स्थान के रूप में विकसित किया गया जहाँ साल में एक बार सभी रिश्तेदार और दोस्त मिल सकें, अनाज के बदले अपनी ज़रूरत का सामान (वस्तु विनिमय - Barter System) ले सकें और उत्सव मना सकें। पहले आलीराजपुर भी झाबुआ का हिस्सा था, इसलिए "झाबुआ का भगोरिया" सबसे अधिक प्रसिद्ध है। पुराने समय में यहाँ तीर-कमान का प्रदर्शन वीरता के लिए होता था, जो अब केवल एक रस्म और सजावट का हिस्सा रह गया है। इतिहास में इसे 'स्वयंवर' के रूप में देखा जाता था, लेकिन वर्तमान में यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक गौरव का पर्व अधिक है। प्राचीन समय में, भगोरिया केवल उत्सव नहीं था बल्कि भील योद्धाओं के शक्ति प्रदर्शन का केंद्र भी था। यहाँ युवा अपनी तीरंदाजी (Archery) और युद्ध कौशल का प्रदर्शन करते थे।

मुगल काल और ब्रिटिश शासन के दौरान भी, जब आदिवासियों पर अपनी संस्कृति छोड़ने का दबाव था, तब भगोरिया हाट ने इन समुदायों को संगठित रखने का काम किया। यह एक ऐसा स्थान था जहाँ दूर-दराज के गाँवों के लोग गुप्त संदेशों और रणनीतियों का आदान-प्रदान करते थे।
  • भगोर स्थान: कुछ विद्वानों का मानना है कि इसका नाम 'भगोर' नामक स्थान से पड़ा जहाँ यह मेला सबसे पहले आयोजित हुआ था।
  • स्वयंवर की परंपरा: इतिहास में इसे आदिवासियों के 'स्वयंवर' के रूप में देखा जाता था, जहाँ युवक-युवतियां अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनते थे।
  • विश्व धरोहर: आज यह उत्सव अपनी ऐतिहासिक मौलिकता के कारण यूनेस्को (UNESCO) की सांस्कृतिक धरोहरों की दौड़ में शामिल है।
 

📜 संक्षिप्त इतिहास (History Snippet)

  • प्रारंभ: राजा भोज के शासनकाल में भील शासकों द्वारा।
  • नाम का आधार: भंगोरा देव या 'भगोर' नामक स्थान।
  • सांस्कृतिक महत्व: मुगल काल और ब्रिटिश काल में भी यह उत्सव निरंतर जारी रहा, जो आदिवासियों के अपनी संस्कृति के प्रति अडिग रहने का प्रतीक है।
  • आधुनिक स्वरूप: आज यह यूनेस्को (UNESCO) जैसी संस्थाओं के लिए भी शोध का विषय है।

🎭 भगोरिया के तीन रंग

  1. गुलालिया: प्रथम दो दिन जब केवल गुलाल लगाकर त्यौहार का स्वागत किया जाता है।
  2. गोल-गधेड़ो: उत्सव के मध्य में होने वाला पारंपरिक खेल, जहाँ युवक गुड़ की पोटली पाने के लिए खंभे पर चढ़ता है।
  3. उजाड़िया: अंतिम दिन जब लोग घर की जरूरी खरीदारी करते हैं और मेला समाप्त होता है।
    कुछ ग्रामीण बताते है कि भगोरिया भगोर रियासत को जीतने का प्रतीक पर्व है। भगौरिया पर्व भगौर रियासत की जीत की बरसी के रूप में खुशी को जाहिर करने के लिए मनाया जाता है। इस अवसर पर आदिवासी खूब नाचते है। गाना,गाते हें ठिठौली करते है। सामूहिक नृत्य इस पर्व की मुख्य विशेषता है। लेकिन समय के साथ-साथ यह प्रकृति और मनुष्य के रिश्तों को अभिव्यक्त करने वाला त्यौहार बन गया है।

गोट प्रथा और लोक संगीत: भगोरिया की आत्मा

भगोरिया केवल रंगों और हाट का मेला नहीं है, बल्कि यह ध्वनि और सामाजिक परंपराओं का एक अनूठा उत्सव है। यहाँ की 'गोट प्रथा' और 'वाद्य यंत्र' इसे दुनिया के अन्य मेलों से अलग बनाते हैं।

🤝 गोट प्रथा: सामाजिक सद्भाव का प्रतीक

भगोरिया मेले में 'गोट' (Got) का अर्थ है 'समूह' या 'बिरादरी का मिलन'।

  • सामूहिक भोज: गोट प्रथा के अंतर्गत विभिन्न गाँवों के लोग अपने-अपने समूह (गोट) में बैठते हैं और साथ मिलकर भोजन करते हैं।
  • विवादों का निपटारा: पुराने समय में, गोट का उपयोग गाँवों के बीच चल रहे आपसी मनमुटाव या विवादों को सुलझाने के लिए किया जाता था। मांदल की थाप पर कसम खाकर लोग अपनी दुश्मनी भुला देते थे।
  • रिश्तेदारी: नए रिश्तों की नींव भी इसी 'गोट' में चर्चा के दौरान रखी जाती है।

🥁 भगोरिया के पारंपरिक वाद्य यंत्र

मेले की गूँज इन वाद्य यंत्रों के बिना अधूरी है:

वाद्य यंत्र विशेषता
मांदल (Mandal) मिट्टी या लकड़ी से बना बड़ा ढोल, जिसकी गूँज कई किलोमीटर तक सुनाई देती है।
बाँसुरी (Flute) भील युवकों द्वारा हाथों से बनाई गई बाँसुरी, जो प्रेम और शांति का प्रतीक है।
कुंडी (Kundi) मिट्टी से बना एक छोटा वाद्य यंत्र जिसे हाथ से बजाया जाता है।
थाली और घुँघरू नृत्य की लय (Rhythm) को बनाए रखने के लिए इनका उपयोग किया जाता है।
💡 क्या आप जानते हैं?
भगोरिया मेले में बजने वाला 'मांदल' आदिवासियों के लिए एक पवित्र वाद्य यंत्र है। इसे बनाने की प्रक्रिया और इसकी पूजा की भी एक विशेष परंपरा है।

गोट प्रथा

गोट प्रथा थीः- ग्रामीण बताते है कि भगोरिया हाटो में पहले महिलाएं समूह में बाजार में आती थी एवं किसी परिचित पुरूष को पकडकर उससे ठिठौली करती थी एवं उसके बदले उस पुरूष से मेले में धूमने एवं झूलने का खर्च लेती थी या पान खाती थी। इस प्रथा को गोट प्रथा कहा जाता था। यह भगौरिया हाट की परंपरा मानी जाती थी।
             भगोरिया पर्व को लेकर किवदन्तियों के अनुसार भगोर किसी समय अंचल का प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र हुआ करता था और यहां के ग्राम नायक द्वारा एक बार जात्रा का आयोजन किया गया। जिसमें आस पास के सभी युवक युवतियों को आमत्रित किया गया। सज धज कर युवक युवतियों ने हिस्सा लिया। ग्राम नायक ने इस अवसर पर मेले जैसा आयोजन किया। आये हुए आगन्तुकों में एक सुन्दर एवं कमसीन बाला को देख कर ग्राम नायक का दिल उस पर आ गया ओर उसने उसे पान का बिडा पेश किया तो शर्मा कर उसने कबुल कर लिया और ग्राम नायक ने उस कन्या की सहमति से उसका अपहरण कर लिया याने उसे भगा कर ले गया और इसी परम्परा की शुरूवात को भगौरिया का नाम दिया गया एक और किवदन्नी के अनुसार शिव पुराण में भी भगोरिया का उल्लेख आता है जिसके अनुसार भव एवं गौरी शब्द का अपभ्रश भगोरिया के रूप में सामने आया है। भव का अर्थ होता है शिव और गौरी का अर्थ पार्वती होता है।-दोनों के एकाकार होने को ही भवगौरी कहा जाता है। अर्थात फाल्गुन माह के प्रारंभ में जब शिव ओर गौरी एकाकार हो जाते है तो उसे भवगौरी कहा जाता है। और यही शब्द अप्रभंश होकर भगोरिया के नाम से प्रचलित हुआ है।

भगोरिया और होली

          होली पर्व के सात दिन पूर्व से जिस ग्राम एवं नगर में हाट बाजार लगते है उसकों भगोरिया हाट कहा जाता है। भगोरिया पर्व,में आदिवासियों द्वारा गल देवता की मन्नत लेकर सात्विक जीवन व्यतित किया जाता है, जमीन पर सोते है तथा ब्रहमचर्य व्रत का पालन करते है तथा इन भगोरियो में सफेद वस्त्र लपेट कर शरीर पर पीली हल्दी लगा कर तथा हाथ में नारियल लेकर आते है। गल देवता की मन्नत लेकर सात दिन तक उपवास परहेज करते है एवं होलिका दहन के दूसरे दिन गल देवता को जो लकड़ी का बना लगभग 30-40 फीट ऊँचा होता है। उस पर मन्नत वाला व्यक्ति चढ जाता है। एवं उसे अन्य व्यक्तियों द्वारा रस्सी से उपर धुमाया जाता है। इसी प्रकार मन्नत उतारते है। भगोरिया पर्व का वास्तविक आधार देखे तो पता चलता है कि इस समय तक फसले पक चुकी होती है तथा किसान अपनी फसलों के पकने की खुशी में अपना स्नेह व्यक्त करने के लिये भगोरिया हाट में आते है।
         भगोरिया हाट में झुले चकरी, पान,मीठाई,सहित श्रृंगार की सामग्रिया,गहनों आदि की दुकाने लगती है जहां युवक एवं युवतियां अपने अपने प्रेमी को वेलेण्टाईन की तरह गिफ्ट देते नजर आते हैं। आज कल भगोरिया हाट से भगा ले जाने वाली घटनायें बहुत ही कम दिखाई देती है क्योकि शिक्षा के प्रसार के साथ शहरी सभ्यता की छाप लग जाने के बाद आदिवासियों के इस पर्व में काफी बदलाव दिखाई दे रहा है।
आभूषण

आभूषण

अलंकरण अपना विशेष महत्‍व रखता है। सामान्‍यत: भील स्‍त्री पुरूष विविध प्रकार के गहने पहनते हैं। ये गहरे कथीर , चाँदी और कांसे के बने होते हैं। जिनमें से भी कथीर का प्रचलन सर्वाधिक है। आज के वर्तमान संदर्भो में जहां पारम्‍परिक आदिवासी आभूषणों को आधुनिक समाज ने फैशन के नये आयामों के रूप में स्‍वीकार कर लिया है तो आदिवासी शिल्‍पों में उसका महत्‍व और अधिक हो जाता है। आदिवासी संस्‍कृति के अनुरूप कमर में काले रंग का मोटा घागा (बेल्‍ट नुमा) पहनाए जाते हैं। स्‍त्री के पैरों में कड़ला, बाकडिया, रमजोल, लंगरलौड, नांगर, तोडा, पावलिया, एवं पैरो की अंगुलियों में बिछिया जो कि भीली महिलाओं के सौभाग्‍य के प्रतीक आभूषण होते हैं, धारण करती है।                   गले में तागली, हंसली या गलसन (मोतियों की माला), जबरबंद (पैसों की माला), कानों में बालियां, टोकडी, मोरफैले, झांझऱया(एक गोल रिंग में गोल गोल कथीर के छल्‍ले), हाथ में बाहरिया, हठका, करोंदी, कावल्‍या (कांच की चूडिया),हाथसांकरी, भुजा में बास्‍टया (बाजूबंद), हठके, हाथ की अंगुलियों में मुंदडी, सिर पर बोर राखडी (छिवरा), झेला (चाँदी की लडियों वाला सांकल),बस्‍का (चाँदी या कथीर के चिमट) आदि पहने जाते हैं। इसी तरह पुरूषों के हाथों में बौहरिया,कमर में कंदोरा, कानों में मोरखी, गले में तागली पहनाई जाती है। पुरूष कानों में मूंदड़े, टोटवा, गले में बनजारी या सांकल, हाथ में नारह-मुखी(चाँदी के कड़े), भुजा में हठके तथा पाँव में बेडी पहनते हैं।

झाबुआ के प्रसिद्ध हस्तशिल्प (Jhabua Tribal Handicraft)

झाबुआ और आलीराजपुर का विश्वप्रसिद्ध आदिवासी हस्तशिल्प झाबुआ की पहचान केवल मेलों से नहीं, बल्कि यहाँ की अद्भुत कलाकृतियों से भी है। यहाँ के हस्तशिल्प न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी काफी पसंद किए जाते हैं। झाबुआ के हस्तशिल्प में यहाँ की मिट्टी और संस्कृति की महक बसी है। यहाँ के मुख्य आकर्षण निम्नलिखित हैं:

  • झाबुआ की आदिवासी गुड़िया (Jhabua Adivasi Dolls): यह झाबुआ का सबसे प्रसिद्ध हस्तशिल्प है। इन गुड़ियों को भील और भिलाला जनजाति के पारंपरिक कपड़ों और आभूषणों से सजाया जाता है। इन्हें मिट्टी, कपड़े और लकड़ी के बुरादे से बनाया जाता है। झाबुआ की इन गुड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीआई टैग (GI Tag) पहचान मिल चुकी है।
  • पिथोरा पेंटिंग (Pithora Painting) यह एक विश्वप्रसिद्ध लोक कला है जिसे भील जनजाति के कलाकार दीवारों पर बनाते हैं। यह केवल पेंटिंग नहीं, बल्कि एक धार्मिक अनुष्ठान है। इसमें घोड़ों, हाथियों और प्रकृति के चित्रों के माध्यम से पूर्वजों और देवताओं को खुश किया जाता है। पद्मश्री से सम्मानित स्व. पेमा फत्या जी इस कला के सबसे बड़े नाम रहे हैं।
  • पारंपरिक तीर-कमान: आदिवासी समाज में तीर-कमान शौर्य का प्रतीक है। अब इन्हें छोटे आकार (Souvernir) में सजावट के उद्देश्य से बनाया जाता है। पर्यटक इन्हें स्मृति चिन्ह के रूप में खरीदना बहुत पसंद करते हैं।।
  • पत्थर और मोती के आभूषण (Beads Jewelry): आदिवासी महिलाएं रंगीन मोतियों (Beads) और सिक्कों से बने गहने पहनती हैं। हाथ से बनाई गई 'मोतियों की माला' और 'कंगन' सैलानियों के बीच काफी लोकप्रिय हैं।।
  • बाँस शिल्प: झाबुआ का बाँस शिल्प (Bamboo Work) यहाँ की जनजातीय कला का एक अद्भुत उदाहरण है। भील और भिलाला जनजाति के कलाकार बाँस की लकड़ियों को तराश कर न केवल घरेलू उपयोग की वस्तुएँ बनाते हैं, बल्कि शानदार सजावटी कृतियाँ भी तैयार करते हैं। बाँस से बनी लैंपशेड, फूलदान (Vases), और दीवारों पर टांगने वाले शो-पीस। बांस से बनी टोकरियाँ, चटाइयां और सजावटी सामान।

स्मृति चिन्ह (Souvenirs) के रूप में झाबुआ की 'भीली गुड़िया' जरूर खरीदें!


महुए के फल से बनाई जाती है ताड़
                  कहा तो यह भी जाता कि भगोरिया भव अर्थात भगवान शंकर व गौरी अर्थात पार्वती के अनूठे विवाह की याद में उस विवाह की तर्ज पर भवगौरी अर्थात भगोरिया नाम से अब तक मनाया जाता है। भगवान शंकर का पुरूषार्थ व प्रणय ही इसी कारण से इसके मुख्य अवयव भी रहे हैं। बहरहाल आदिम संस्कृति की उम्र वे तेवर से जुड़े होने के कारण भगोरिया आदिवासी वर्ग की महत्वपूर्ण धरोहर है । इसे उतनी ही पवित्रता से देखा व स्वीकार किया जाना चाहिए। जिस पवित्रता के साथ किसी भी संस्कृति का वर्तमान अपने अतीत को स्वीकार करता है। इसी में भगोरिए के हर स्वरूप की सार्थकता भी है।
ताड़ी की खुमारी में डूबे ग्रामीणों की कुर्राटी की आवाज सुनाई देती है। युवकों की अलग-अलग टोलियां सुबह से ही बांसुरी-ढोल-मांदल बजाते मेले में घूमते हैं। वहीं, आदिवासी लड़कियां हाथों में टैटू गुदवाती हैं। आदिवासी नशे के लिए ताड़ी पीते हैं। हालांकि, वक्त के साथ मेले का रंग-ढंग बदल गया है। अब आदिवासी लड़के परम्परागत कपड़ों की बजाय अत्याधुनिक परिधानों में ज्यादा नजर आते हैं। मेले में गुजरात और राजस्थान के ग्रामीण भी पहुंचते हैं। हफ्तेभर काफी भीड़ रहती है।

विदेशी पर्यटक

भगोरिया मेले में विदेशी पर्यटकों का क्रेज

मध्य प्रदेश का भगोरिया उत्सव अब वैश्विक पर्यटन का हिस्सा है। जर्मनी, फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों से पर्यटक यहाँ की भील-भिलाला संस्कृति को देखने आते हैं।

पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण:

  • पारंपरिक आदिवासी नृत्य और संगीत
  • हाट बाजार की रौनक
  • स्वदेशी खान-पान और हस्तशिल्प
विदेशी पर्यटकों को भगोरिया में क्या आकर्षित करता है? भगोरिया पर्व भील जनजाति की हजारों वर्ष पुरानी सामाजिक परंपराओं का जीवंत उदाहरण है। विदेशी पर्यटक इसे “Living Tribal Heritage” मानते हैं। यहाँ की रंग-बिरंगी वेशभूषा, ढोल-मांदल की थाप और पारंपरिक नृत्य विदेशी फोटोग्राफरों और व्लॉगर्स के लिए एक "विजुअल ट्रीट" होते हैं। भगोरिया में होने वाली 'गोट प्रथा' और आदिवासियों का जीवन दर्शन पश्चिमी पर्यटकों को बहुत प्रभावित करता है। विदेशी मेहमान यहाँ की ताजी 'ताड़ी' (ताड़ के पेड़ का रस) और गुड़ की जलेबी का स्वाद लेना काफी पसंद करते हैं। रंगीन घाघरे, चांदी के आभूषण, झुमके और कंदोरा विदेशी फोटोग्राफर्स के लिए बड़ा आकर्षण होते हैं। भगोरिया हाट को विदेशी पर्यटक Open Tribal Market Festival के रूप में देखते हैं, जहाँ स्थानीय उत्पाद, पारंपरिक भोजन और लोक संगीत मिलता है। ढोल, मांदल और बांसुरी की धुनों पर नृत्य करते आदिवासी समूह विदेशी पर्यटकों के लिए एक Rare Cultural Experience होता है। भगोरिया की सबसे अनोखी विशेषता इसकी विवाह चयन परंपरा (Tribal Love & Marriage Tradition) है, जिस पर विदेशी शोधकर्ता विशेष अध्ययन करते हैं। भगोरिया पर्व पर कई International Documentary Films, Travel Vlogs, और Anthropological Research Projects बन चुके हैं। मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग (MP Tourism) भगोरिया पर्व को “Tribal Tourism Festival of Madhya Pradesh” के रूप में प्रचारित करता है। विदेशी पर्यटकों के लिए: लोकल गाइड ट्राइबल होम-स्टे सांस्कृतिक भ्रमण पैकेज उपलब्ध कराए जाते हैं। भगोरिया पर्व में आने वाले विदेशी पर्यटक मुख्य रूप से निम्न देशों से होते हैं: फ्रांस (France) जर्मनी (Germany) यूनाइटेड किंगडम (UK) संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) इटली (Italy) स्पेन (Spain) ऑस्ट्रेलिया (Australia) जापान (Japan) ये पर्यटक Tribal Culture of India, Indian Folk Traditions और Pre-Holi Festivals पर रिसर्च करने आते हैं। भगोरिया मेले में आने वाले विदेशी पर्यटकों हेतु पर्यटन विकास निगम द्वारा आलीराजपुर जिले के सोंडवा गांव में टेंट विलेज बनाया जाता है ।

## पहुँचने के रास्ते: रूट मैप (How to Reach Bhagoriya)

झाबुआ और आलीराजपुर पहुँचने के लिए सबसे अच्छे रास्ते यहाँ दिए गए हैं:
1. हवाई मार्ग द्वारा (By Air)
निकटतम हवाई अड्डा: देवी अहिल्याबाई होलकर एयरपोर्ट, इंदौर (IDR)।
दूरी: इंदौर से झाबुआ लगभग 150 किमी है। एयरपोर्ट से आप टैक्सी या बस ले सकते हैं।

2. रेल मार्ग द्वारा (By Train)
निकटतम रेलवे स्टेशन: मेघनगर (MGN)। यह दिल्ली-मुंबई मुख्य रेल मार्ग पर स्थित है।
झाबुआ शहर से मेघनगर की दूरी मात्र 15 किमी है। यहाँ से ऑटो और बसें आसानी से मिल जाती हैं।
3. सड़क मार्ग द्वारा (By Road)
झाबुआ सड़क मार्ग से बहुत अच्छी तरह जुड़ा हुआ है:
इंदौर से: इंदौर → धार → सरदारपुर → झाबुआ (NH-47)। समय: लगभग 3-4 घंटे।
गुजरात (दाहोद) से: दाहोद → झाबुआ। दूरी: मात्र 35 किमी।
रतलाम से: रतलाम → पेटलावद → झाबुआ। दूरी: लगभग 95 किमी।

💡 क्या आप जानते हैं?

  • भगोरिया का नाम: कहा जाता है कि इसका नाम 'भंगोरा' देव के नाम पर पड़ा।
  • शादी का बाजार: पुराने समय में इसे जीवनसाथी चुनने का प्रमुख स्थान माना जाता था।
  • विश्व धरोहर: यूनेस्को की सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल करने की मांग उठती रही है।






Bhagoriya Festival is one of the most vibrant tribal festivals of India, celebrated in western Madhya Pradesh. The festival showcases tribal freedom, culture, music, dance and traditional markets. It has become a major attraction for foreign tourists, photographers and cultural researchers.
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