मेघनगर की ज़हरीली फैक्ट्रियाँ: जल-जंगल-ज़मीन पर मंडराता बड़ा खतरा

मेघनगर की कैमिकल फैक्ट्रियों से निकलने वाला जहरीला पानी नदी-नालों के जरिए गांवों तक पहुँचकर खेत, मवेशी और इंसानों को तबाह कर रहा है।
मेघनगर। झाबुआ जिले का वह औद्योगिक क्षेत्र, जहाँ विकास के नाम पर लगाई गई केमिकल फैक्ट्रियाँ अब पूरे इलाके के लिए विनाश का कारण बन चुकी हैं। इन फैक्ट्रियों से निकलने वाला जहरीला कचरा छोटे-छोटे नालों से होता हुआ बड़ी नदियों में मिल रहा है और यही पानी आस-पास के गाँवों तक पहुँचकर खेतों, पशुओं, पक्षियों और इंसानों के जीवन को धीरे-धीरे निगल रहा है। नदियों और नालों का पानी अब साफ नहीं रहा, उसमें जहरीली गंध और अजीब रंग घुल चुका है। मछलियाँ तड़पकर मर रही हैं, यहाँ तक कि राष्ट्रीय पक्षी मोर भी इस जहर की चपेट में आ रहे हैं। पानी की इस तबाही का असर सीधे किसानों पर पड़ा है। खेतों में बोई जाने वाली सोयाबीन, मक्का और कपास जैसी फसलें अब उपजने की बजाय कुम्हला रही हैं। मिट्टी अपनी उपजाऊ शक्ति खो रही है और किसान कर्ज़ के बोझ तले दबते जा रहे हैं। 
        आदिवासी समाज, जो अपनी आजीविका के लिए मवेशियों पर निर्भर करता है, अब अपने ही पशुओं की लाशें उठाने को मजबूर हो रहा है। गाय, बैल और बकरियाँ जहरीला पानी पीकर बीमार हो रही हैं और दम तोड़ रही हैं। जंगलों और खेतों में चरने वाले वन्य जीव भी इस प्रदूषण का शिकार हैं। हिरण और खरगोश जैसे जीव नालों का पानी पीकर बीमार पड़ रहे हैं और उनकी भी मौतें बढ़ रही हैं। सबसे डरावनी स्थिति यह है कि पीने का पानी भी जहरीला हो गया है। हैंडपंप और कुओं से निकलने वाला पानी अब पीला हो गया है और उसका स्वाद कड़वा और जहरीला हो चुका है। गाँवों के बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग पेट की बीमारियों, त्वचा संक्रमण और सांस की समस्याओं से जूझ रहे हैं। चिकित्सक साफ कह रहे हैं कि यह सब जहरीले कैमिकल की वजह से हो रहा है। कई गाँवों में कैंसर, लीवर की बीमारी और अस्थमा जैसे गंभीर रोग भी सामने आ रहे हैं। लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी जीने के बजाय अब सिर्फ बीमारियों और समस्याओं से लड़ने में व्यस्त हैं। 
Jhabua News- Toxic factories of Meghnagar: A big threat looms over water, forest and land - मेघनगर की ज़हरीली फैक्ट्रियाँ: जल-जंगल-ज़मीन पर मंडराता बड़ा खतरा
         सोशल मीडिया इस समय गाँववालों की आवाज़ बन चुका है। हर दिन स्थानीय लोग वीडियो और तस्वीरें डाल रहे हैं जिनमें साफ दिखता है कि कैसे मछलियाँ मर रही हैं, फसलें सड़ रही हैं और पानी ज़हर बन चुका है। लोग लिख रहे हैं – “प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड आखिर सो क्यों रहा है?” “क्या जिला कलेक्टर और नेताओं की आँखें बंद हो गई हैं?” “क्या सबको सिर्फ कमीशन की पड़ी है?” यह गुस्सा अब सड़कों तक पहुँचने लगा है। 22 अगस्त को मेघनगर और आसपास की 10-12 पंचायतों के लोग एकजुट होकर बैठक में जुटे। बैठक का एजेंडा साफ था – “फैक्ट्रियों से फैलते जहरीले प्रदूषण को रोकना।”  इस बैठक में सभी ने मिलकर निर्णय लिया कि अगर अब भी प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो बड़ा आंदोलन होगा। ग्रामीणों ने साफ कहा कि हमारी जान से बढ़कर कोई उद्योग नहीं हो सकता। उनकी माँग है कि प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों को या तो बंद किया जाए या फिर उन्हें इस तरह मजबूर किया जाए कि वे जहरीले पानी को नालों में न बहाएँ। फैक्ट्रियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई हो और उन्हें भारी जुर्माना भरना पड़े।
        विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में मेघनगर और आसपास का पूरा इलाका “डेड ज़ोन” में बदल जाएगा, जहाँ न खेती संभव होगी, न पीने योग्य पानी मिलेगा और न ही लोग सुरक्षित रह पाएँगे। प्रशासन और नेताओं की चुप्पी ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सिर्फ नाम का रह गया है, ज़मीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं होती। विधायक और सांसद इस गंभीर समस्या पर कुछ भी बोलने से बचते हैं और जनता को लगता है कि उनकी चुप्पी का कारण सिर्फ भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी है। ऐसे में अब जनता ने ही जागरूक होकर इस लड़ाई को आगे बढ़ाने की ठानी है। पंचायत की बैठक इसी दिशा में पहला कदम है। यदि जनता संगठित होकर खड़ी होगी तो प्रशासन और सरकार को मजबूर होना पड़ेगा। अन्यथा यह प्रदूषण महामारी का रूप ले लेगा और आने वाले वर्षों में हजारों लोग इसकी चपेट में आकर अकाल मौत मरेंगे। मेघनगर की यह त्रासदी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर विकास किस कीमत पर? उद्योग ज़रूरी हैं लेकिन इंसानों और प्रकृति की कीमत पर नहीं। आज जरूरत है ठोस कदम उठाने की, जहरीली फैक्ट्रियों पर लगाम लगाने की और लोगों की ज़िंदगी बचाने की। जनता की जागरूकता ही अब इस संकट से बाहर निकलने का रास्ता है और यही आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार बनेगी।