झाबुआ भगोरिया महापर्व 2026: सांस्कृतिक पुनर्जागरण, 'राष्ट्रीय पर्व' का गौरव और सियासत का महासंगम भगोरिया के रंग में रंगा पूरा अंचल

“Explore the grand celebration of Jhabua Bhagoria 2026. From MP CM’s declaration of Bhagoria as a National Festival to the massive political.

झाबुआ की मांदल पर थिरकी नई पीढ़ी, 'राष्ट्रीय उत्सव' की गूंज अब सात समंदर पार

झाबुआ: झाबुआ की पावन धरा पर आयोजित होने वाला 'भगोरिया' केवल एक लोक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की आत्मा, उनके अदम्य साहस और उल्लास का जीवंत प्रतिबिंब है। वर्ष 2026 का यह भगोरिया उत्सव इतिहास के पन्नों में अपनी एक अलग और अमिट पहचान छोड़ गया है। इस वर्ष न केवल झाबुआ की सड़कों पर जन-समुद्र उमड़ा, बल्कि प्रदेश सरकार की ऐतिहासिक घोषणाओं और राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी ने इस पर्व को एक नई ऊंचाई प्रदान की है। झाबुआ के मुख्य हाट से लेकर रानापुर की गलियों और पेटलावद के मैदानों तक, हर तरफ ढोल-मांदल की थाप और आदिवासी संस्कृति का गौरव गूंज रहा है। मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल का सबसे बड़ा सांस्कृतिक उत्सव भगोरिया रविवार को झाबुआ में पूरे उत्साह और पारंपरिक रंगों के साथ मनाया गया। मांदल की थाप, उड़ते गुलाल और पारंपरिक वेशभूषा में सजे युवक-युवतियों ने हाट बाजारों को जीवंत बना दिया। सुबह से ही राणापुर, मेघनगर और आसपास के भगोरिया हाटों में बड़ी संख्या में ग्रामीणों और युवाओं की भीड़ उमड़ पड़ी। पारंपरिक चांदी के आभूषण, रंगीन पगड़ियां और लोकनृत्य ने पूरे क्षेत्र को उत्सव में बदल दिया। भगोरिया, जो होली से पहले मनाया जाने वाला आदिवासी समाज का प्रमुख पर्व है, केवल एक मेला नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यह पर्व मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ क्षेत्र में विशेष रूप से मनाया जाता है और इसमें भील सहित कई जनजातीय समुदाय भाग लेते हैं। 

Jhabua News -Jhabua Bhagoria Festival 2026: Cultural renaissance, the pride of a 'national festival' and a grand confluence of politics, the entire region is drenched in the colours of Bhagoria-   झाबुआ भगोरिया महापर्व 2026: सांस्कृतिक पुनर्जागरण, 'राष्ट्रीय पर्व' का गौरव और सियासत का महासंगम भगोरिया के रंग में रंगा पूरा अंचल
Jhabua Bhagoriya Festival 2026


सोशल मीडिया वाला नया भगोरिया

इस बार भगोरिया में एक नया ट्रेंड भी देखने को मिला — परंपरा के साथ डिजिटल रंग। युवाओं ने पारंपरिक परिधान पहनकर इंस्टाग्राम रील्स और वीडियो बनाए। कई स्थानों पर रंग उड़ाते हुए स्लो-मोशन वीडियो शूट किए गए और तुरंत सोशल मीडिया पर साझा किए गए। अब भगोरिया केवल हाट तक सीमित नहीं रहा — बल्कि डिजिटल दुनिया में भी पहुंच गया है। स्थानीय युवाओं का कहना है कि यह उनकी संस्कृति को दुनिया तक पहुंचाने का तरीका है, जबकि बुजुर्गों ने इस बदलाव को “भागीदारी से प्रदर्शन की ओर बढ़ता उत्सव” बताया। झाबुआ भगोरिया 2026 की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इस बार मांदल की थाप के साथ डिजिटल क्रांति का एक नया अध्याय जुड़ गया है। परंपरा और तकनीक का यह संगम इस कदर हावी रहा कि इसे अब 'डिजिटल भगोरिया' कहा जाने लगा है।

  •  इंस्टाग्राम रील्स और 'स्लो-मोशन' का जादू

इस साल मेले में केवल गुलाल नहीं उड़ा, बल्कि हर तरफ मोबाइल कैमरे और ट्राइपॉड नजर आए। युवाओं ने पारंपरिक चांदी के हंसली, कड़े और रंगीन साफे के साथ आधुनिक ब्रांडेड धूप का चश्मा (Sunglasses) और स्पोर्ट्स शूज पहनकर एक नया 'फ्यूजन लुक' अपनाया। मेले के बीच में रंग उड़ाते हुए स्लो-मोशन वीडियो और पारंपरिक नृत्य (गैर) के साथ ट्रांजिशन रील्स सबसे ज्यादा ट्रेंड कर रही हैं।  झाबुआ के स्थानीय युवाओं, जैसे दीपक और रेखा, ने बताया कि भगोरिया के वीडियो पोस्ट करने के मात्र 5 दिनों के भीतर उनके सोशल मीडिया पर 3,000 से अधिक नए फॉलोअर्स बढ़ गए। अब दिल्ली, मुंबई और विदेशों में बैठे लोग भी इन वीडियो के जरिए भगोरिया की लाइव लोकेशन पूछ रहे हैं। डिजिटल दीवानगी का आलम यह है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। मेले में प्रोफेशनल फोटोग्राफर्स और वीडियो एडिटर्स सक्रिय रहे: स्थानीय फोटोग्राफर्स ₹200 से ₹500 के बीच मौके पर ही प्रोफेशनल रील बनाकर, ट्रेंडिंग म्यूजिक के साथ एडिट करके युवाओं को दे रहे हैं। हाट के कोनों में छोटे-छोटे 'शूटिंग पॉइंट्स' बन गए हैं, जहाँ बैकग्राउंड में मांदल बज रही होती है और युवा अपनी संस्कृति को कैमरे में कैद करवा रहे होते हैं।

  • पहचान का वैश्विक मंच (Global Identity)

पलायन कर गुजरात या महाराष्ट्र गए युवा अब भगोरिया को केवल त्योहार के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे अपनी जड़ों (Roots) के प्रदर्शन का जरिया मानते हैं। उनका तर्क है कि "यदि हम अपनी संस्कृति को सोशल मीडिया पर नहीं दिखाएंगे, तो दुनिया हमारी कहानी कभी नहीं जान पाएगी।" यह डिजिटल सक्रियता अब भगोरिया को झाबुआ की गलियों से निकालकर दुनिया के मोबाइल स्क्रीन तक ले गई है। जहाँ युवा इसे 'प्रचार' मान रहे हैं, वहीं समाज के बुजुर्ग इस बदलाव को लेकर थोड़े असहज हैं:  बुजुर्गों का कहना है कि "पहले लोग उत्सव में शामिल होने आते थे, अब सिर्फ रिकॉर्ड करने आते हैं।" उनके अनुसार, कैमरे के चक्कर में लोग नृत्य और मिलन के वास्तविक आनंद को खो रहे हैं।  पुराने जानकारों का मानना है कि उत्सव का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व अब 'दिखावे' (Display) की ओर बढ़ रहा है। अंततः, यह 'सोशल मीडिया वाला भगोरिया' इस बात का प्रमाण है कि नई पीढ़ी अपनी परंपराओं को छोड़ नहीं रही, बल्कि उन्हें आधुनिक भाषा में ढाल रही है। झाबुआ का यह उत्सव अब एक डिजिटल ग्लोबल स्टेज बन चुका है, जहाँ 'जय जोहार' की गूंज और मांदल की थाप हैशटैग #Bhagoria2026 के साथ सात समंदर पार तक सुनाई दे रही है।

ऐतिहासिक घोषणा: 'भगोरिया' अब बनेगा राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक

इस वर्ष के भगोरिया की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक खबर मध्य प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र से निकलकर आई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक युगांतरकारी घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि मालवा और निमाड़ अंचल के जनजातीय क्षेत्रों में मनाया जाने वाला यह सुप्रसिद्ध 'भगोरिया लोकपर्व' अब केवल एक क्षेत्रीय मेला नहीं रहेगा, बल्कि इसे राज्य सरकार द्वारा 'राष्ट्रीय पर्व' के रूप में मनाया जाएगा। मुख्यमंत्री की यह घोषणा इस बात का प्रमाण है कि सरकार जनजातीय अस्मिता और उनकी समृद्ध विरासत को वैश्विक पटल पर स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार का यह कदम जनजातीय अस्मिता को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। इस घोषणा के साथ ही सरकार ने विकास और संस्कृति के अनूठे संगम की रूपरेखा भी तैयार की है। मुख्यमंत्री ने केवल पर्व की घोषणा ही नहीं की, बल्कि इसके साथ विकास का एक ठोस रोडमैप भी प्रस्तुत किया है। सरकार ने जनजातीय बहुल जिलों—बड़वानी, धार और झाबुआ—के सर्वांगीण उत्थान के लिए 'कृषि कैबिनेट' आयोजित करने का निर्णय लिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कैबिनेट बैठक भगोरिया पर्व के दौरान ही आयोजित की जा रही है। इसका सीधा लक्ष्य सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित करने के साथ-साथ क्षेत्र के अन्नदाताओं और स्थानीय निवासियों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करना है। यह पहल दिखाती है कि कैसे परंपराओं के बीच आधुनिक विकास की नींव रखी जा सकती है।

झाबुआ भगोरिया 2026: जनसैलाब के बीच राजनीतिक दलों का सांस्कृतिक और सियासी शक्ति प्रदर्शन

झाबुआ की पावन माटी पर जब 'भगोरिया' का शंखनाद होता है, तो वह केवल एक मेला नहीं रह जाता, बल्कि वह जनजातीय गौरव, एकता और शक्ति का महासंगम बन जाता है। इस वर्ष 1 मार्च 2026 को झाबुआ के मुख्य भगोरिया हाट ने एक ऐसा ऐतिहासिक दृश्य प्रस्तुत किया, जिसे वर्षों तक याद रखा जाएगा। झाबुआ की सड़कें जन-समुद्र में तब्दील हो गईं और पारंपरिक वेशभूषा में सजे हजारों लोगों के बीच प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। ढोल-मांदल की थाप के साथ इस बार 'सियासी थाप' भी उतनी ही प्रखर नजर आई।

  • भारत आदिवासी पार्टी (BAP): 'जय जोहार' और 'भील प्रदेश' का बुलंद उद्घोष

झाबुआ भगोरिया हाट के केंद्र में इस बार भारत आदिवासी पार्टी (BAP) की जबरदस्त धमक देखने को मिली। सामाजिक कार्यकर्ताओं और पार्टी के बैनर तले निकाली गई इस वर्ष की पहली 'गैर' आकर्षण का मुख्य केंद्र रही।इस गैर का नेतृत्व स्वयं BAP विधायक कमलेश्वर डोडियार ने किया। उनके साथ हजारों की संख्या में युवा और पारंपरिक योद्धाओं के रूप में सजे ग्रामीण शामिल थे। यह केवल एक नृत्य दल नहीं था, बल्कि एक वैचारिक मार्च भी था। गैर के दौरान हवा में 'जय जोहार' और 'जय भील प्रदेश' के नारे गूंज रहे थे, जो जनजातीय स्वाभिमान और उनकी अलग पहचान की मांग को मजबूती से दर्शा रहे थे। पारंपरिक हथियारों, तीर-कमान और ढोल के साथ निकली इस गैर ने यह संदेश दिया कि आदिवासी समाज अपनी जड़ों की रक्षा के लिए पूरी तरह संगठित है।

  • कांग्रेस का ऐतिहासिक संगम: 'जीतू पटवारी' और 'भूरिया' परिवार का पारंपरिक नृत्य

कांग्रेस पार्टी ने इस महापर्व को अपने सांगठनिक कौशल और जनता से जुड़ाव के अवसर के रूप में भुनाया। झाबुआ के हृदय स्थल पर कांग्रेस की उपस्थिति ने उत्सव की रंगत को और बढ़ा दिया।  मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी इस भगोरिया में विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए। उनके साथ अंचल के दिग्गज नेता व पूर्व सांसद कांतिलाल भूरिया, झाबुआ विधायक डॉ. विक्रांत भूरिया, युवा कांग्रेस जिला अध्यक्ष नटवर डोडियार और जिला कांग्रेस अध्यक्ष प्रकाश रांका की पूरी टीम मौजूद थी।  राजनेताओं ने प्रोटोकॉल तोड़कर आम जनता के साथ कदम से कदम मिलाया। जीतू पटवारी और विक्रांत भूरिया ने जब अपने कंधों पर भारी 'मांदल' (पारंपरिक ढोल) उठाया और उसकी थाप पर थिरकना शुरू किया, तो मौजूद जनसमुद्र ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया। कांग्रेस नेतृत्व ने इस भागीदारी के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि वे जनजातीय संस्कृति के सच्चे संरक्षक हैं। कार्यकर्ताओं का उत्साह देखते ही बन रहा था, और भगोरिया की भीड़ में कांग्रेस के झंडे और साफे दूर से ही दिखाई दे रहे थे।

  •  पक्ष-विपक्ष का सांस्कृतिक एकात्मभाव

भगोरिया में राजनीति की कड़वाहट पीछे छूट गई और केवल 'संस्कृति' सर्वोपरि नजर आई। यहाँ भाजपा और अन्य जनप्रतिनिधियों ने अपनी मिट्टी की सुगंध को गले लगाया। झाबुआ भगोरिया महापर्व 2026 के अवसर पर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने एक अत्यंत सुव्यवस्थित और भव्य उपस्थिति दर्ज कराई, जिसने इस सांस्कृतिक उत्सव को एक सशक्त राजनीतिक और सामाजिक संदेश में बदल दिया।  भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष भानू भूरिया ने इस उत्सव में युवाओं की एक विशाल वाहिनी का कुशल नेतृत्व किया, जहाँ उन्होंने स्वयं पारंपरिक वेशभूषा और साफा धारण कर मांदल की थाप पर युवाओं का उत्साहवर्धन किया। भानू भूरिया ने इस दौरान स्पष्ट संदेश दिया कि भगोरिया जनजातीय अस्मिता का प्रतीक है और नई पीढ़ी तकनीक तथा सोशल मीडिया के माध्यम से इस गौरवशाली विरासत को वैश्विक स्तर पर प्रसारित करने का उत्तरदायित्व बखूबी निभा रही है।

इस अवसर पर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री नागर सिंह चौहान और आलीराजपुर-झाबुआ क्षेत्र की सांसद अनिता नागर सिंह चौहान की सक्रिय भागीदारी विशेष रूप से ध्यानाकर्षण का केंद्र रही। मंत्री नागर सिंह चौहान ने आलीराजपुर एवं झाबुआ दोनों ही स्थानों पर गैर का नेतृत्व करते हुए ढोल बजाकर और ग्रामीणों के साथ नृत्य कर पारंपरिक जुड़ाव का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया, वहीं सांसद अनिता चौहान ने इस मंच का उपयोग केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए किया। उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया कि भगोरिया को राष्ट्रीय पर्व का दर्जा मिलने से क्षेत्र में पर्यटन और स्वरोजगार के नवीन द्वार खुलेंगे। सांगठनिक स्तर पर पूर्व विधायक कलसिंह भाबर और भाजपा जिला महामंत्री सोमसिंह सोलंकी ने झाबुआ तथा थांदला अंचल के मेलों में कमान संभाली, जहाँ सोमसिंह सोलंकी ने कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय स्थापित कर 'भाजपा गैर' को अनुशासित और भव्य रूप प्रदान किया, तो वहीं कलसिंह भाबर ने जनजातीय गौरव और लोकगीतों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए ग्रामीणों से सीधा संवाद स्थापित किया।

पूर्व सांसद गुमान सिंह डामोर ने भी रानापुर और झाबुआ के भगोरिया आयोजनों में अपनी चिरपरिचित पारंपरिक शैली में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री फगनसिंह कुलस्ते के साथ मिलकर रानापुर की गैर में सहभागिता की और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाया। भाजपा ने इस बार भगोरिया को एक वृहद रणनीतिक मंच के रूप में उपयोग करते हुए मुख्यमंत्री के 'कृषि कैबिनेट' जैसे अभिनव फैसलों का श्रेय जनता तक पहुँचाया। झाबुआ के मुख्य मार्गों और राजवाड़ा चौक पर पार्टी द्वारा भव्य स्वागत मंच स्थापित किए गए थे, जहाँ से कार्यकर्ताओं ने ग्रामीणों पर पुष्प वर्षा कर उनका आत्मीय स्वागत किया और पेयजल एवं शीतल पेय की व्यवस्था सुनिश्चित की। इन दिग्गज नेताओं की व्यापक उपस्थिति और सांस्कृतिक सक्रियता ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय जनता पार्टी भगोरिया को मात्र एक त्यौहार नहीं, अपितु जनजातीय समाज के साथ आत्मीय और वैचारिक एकात्मता स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम मानती है।  इन नेताओं ने न केवल पारंपरिक वेशभूषा और साफा धारण किया, बल्कि ढोल की थाप पर लोकगीतों का आनंद भी लिया। यह दृश्य इस बात का प्रतीक था कि विचारधाराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन जब बात जनजातीय विरासत की आती है, तो सभी जनप्रतिनिधि एक ही मंच पर नजर आते हैं। 

 सियासत और संस्कृति का अद्भुत कोलाज

कल का झाबुआ भगोरिया किसी फिल्म के भव्य सेट जैसा प्रतीत हो रहा था, जहाँ हजारों ढोल एक साथ बज रहे थे और लाखों पैर एक ही लय में थिरक रहे थे। राजनीतिक दलों के लिए यह 'शक्ति प्रदर्शन' का मंच जरूर था, लेकिन इसका सुखद पहलू यह रहा कि इस शक्ति प्रदर्शन का माध्यम 'संस्कृति' को बनाया गया। BAP का स्वाभिमान, कांग्रेस का सांस्कृतिक जुड़ाव और भाजपा नेताओं की पारंपरिक उपस्थिति ने भगोरिया 2026 को अब तक का सबसे चर्चित और ऐतिहासिक उत्सव बना दिया है। जिधर देखो उधर बस लोगों का हुजूम और रंग-बिरंगी वेशभूषा—इस दृश्य ने यह सिद्ध कर दिया कि भगोरिया केवल झाबुआ का नहीं, बल्कि अब एक राष्ट्रीय गौरव का महापर्व बन चुका है।

2 मार्च 2026: महापर्व का अंतिम दिन 

आज यानी 2 मार्च 2026 को झाबुआ और आसपास के अंचलों में भगोरिया उत्सव का अंतिम दिन है। आज का दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि आज न केवल मेलों का समापन हो रहा है, बल्कि शासन स्तर पर भी बड़ी गतिविधियां हो रही हैं। आज सोमवार को झाबुआ जिले के कई प्रमुख स्थानों पर अंतिम भगोरिया मेलों की धूम है: पेटलावद यह जिले का सबसे बड़ा और अंतिम दिन का मुख्य आकर्षण बना हुआ है। यहाँ क्षेत्रीय विधायकों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की टोलियां अपनी-अपनी 'गैर' लेकर निकल रही हैं। जिला मुख्यालय पर आज अंतिम और सबसे भव्य भगोरिया हाट आयोजित किया जा रहा है, जहाँ लाखों की भीड़ जुटने का अनुमान है।  रम्भापुर, कुंदनपुर, बड़ागुड़ा और रजला में सुबह से ही ढोल की थाप सुनाई दे रही है।

सुरक्षा और व्यवस्था

आज अंतिम दिन होने के कारण भीड़ का नया रिकॉर्ड बन सकता है। इसे देखते हुए प्रशासन ने ड्रोन कैमरों और अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की है। चूँकि आज शाम को होलिका दहन भी है, इसलिए हाट बाजारों में सुबह से ही लोग त्यौहार की अंतिम खरीदारी जैसे गुलाल, नारियल और खजूर के लिए उमड़ पड़े हैं। झाबुआ का भगोरिया 2026 केवल एक बाजार या मेला नहीं रहा, बल्कि यह आदिवासी समाज की अस्मिता और एकता का महाकुंभ बन गया है। जहाँ एक ओर सरकार ने इसे 'राष्ट्रीय पर्व' घोषित कर एक नई पहचान दी है, वहीं दूसरी ओर डिजिटल युग के प्रभाव (रील्स और सोशल मीडिया) के बावजूद लोक संगीत की धुन ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। हजारों की भीड़, धूल उड़ाते पैर, मांदल की गूंज और गुलाल से सजे चेहरे—यह सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं जिसे 'ऐतिहासिक' कहना ही उचित होगा। आज रात होलिका दहन के साथ ही इस 7 दिवसीय महापर्व का औपचारिक समापन हो जाएगा। कल से ग्रामीण अंचलों में 'धुलेंडी' और उसके बाद 'गल पर्व' की शुरुआत होगी।