बेटी है तो कल है
युनिसेफ के अनुसार 10% महिलाएं विश्व जनसंख्या से लुप्त हो चुकी हैं। भारत एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ भी बेटियों की हो रही कमी से चिंतित है। भारत सरकार द्वारा देशभर में 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने 11 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा वर्ष 2012 में की। बच्चियों के प्रति समाज में जागरूकता और चेतना पैदा करने के लिए यह दिवस प्रति वर्ष मनाया जाता है। इन दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि समाज में हर बालिका का सम्मान हो, उसका भी महत्व हो और उसके साथ बराबरी का व्यवहार किया जाए।
वर्ष 1991 मे हुई जनगणना से लिंग-अनुपात की बिगड़ती प्रवृत्ति को देखते हुए, कई राज्यों ने बेटीयों के हित के लिये योजनाएं शुरू की। जैसे कि- – मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री ‘कन्यादान योजना एवं लाडली लक्ष्मी योजना’, भारत सरकार द्वारा ‘धन लक्ष्मी योजना’, आंध्र प्रदेश द्वारा ‘बालिका संरक्षण योजना’, हिमाचल प्रदेश ने ‘बेटी है अनमोल’ योजना शुरू की तो पंजाब में बेटियों के लिए ‘रक्षक योजना’ की शुरूवात की गई। ऐसी और भी योजनाएं अन्य राज्यों में चलाई जा रही है।
बेशक आज बेटियों के हित में अनेक योजनाएं चलाईं जा रही हैं, किंतु भारतीय परिवेश में बेटियों के प्रति विपरीत सामाजिक मनोवृत्तियों ने बच्चियों के लिए असुरक्षित और असुविधाजनक माहौल का ही निर्माण किया है। योजनाएं तो बन जाती हैं परन्तु उनका क्रियान्वन जागरुकता के अभाव में सिर्फ कागजी पन्नो में ही सिमट कर रह जाता है। बेटीयों का अस्तित्व, शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास, सुरक्षा और कल्याण, समाज में व्याप्त रुढीवादिता और संकीर्ण सोच की बली चढ जाता है।
मंदिरों में देवी पूजा, नवरात्रों में कन्या पूजा महज चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात को ही चरितार्थ करती है क्योंकि अधिकांशतः तो बेटीयाँ उपेक्षा की ही शिकार होती हैं। आज हम चाँद से भी आगे जाने की बात करते हैं, दुनिया को मुठ्ठी में बंद करने की तकनिक का इजात कर रहे हैं। आधुनिक सोच का ढोल बजाते हैं लेकिन जब बेटे और बेटी की बात आती है तो, सारी उम्मीद बेटे से लगाते हैं। अपनी सारी जमापूंजी बेटे की शिक्षा ओर विकास पर खर्च कर देते हैं। बेटी को पराया धन कहकर उसकी शिक्षा पर अंकुश लगा देते हैं। ये दोहरा मापदंड बेटीयों के लिए किसी त्रासदी से कम नही है।
कई बुद्धीजीवी वर्ग “बेटी बचाओ” का अभियान चला रहे हैं, जो नुक्कङ नाटकों के माध्यम से समाज में जागरुकता लाने का प्रयास कर रहे हैं। इसमें कोई शक नही क्योंकि आज शिक्षा और हुनर को हथियार बनाकर बेटीयां भारतीय प्रशासनिक सेवा से लेकर सेना में, शिक्षा के क्षेत्र से लेकर अंतरिक्ष तक में अपना एवं देश का नाम रौशन कर रही हैं। यहाँ तक कि पुरूष प्रधान क्षेत्र जैसे कि- रेलवे चालक, बस चालक एवं ऑटो चालक में भी अपनी उपस्थिती दर्ज करा रहीं हैं। फिरभी कुछ विपरीत सोच उसके अस्तित्व को ही नष्ट कर रहीं हैं।
बेटी बचाओ जैसी योजनाएं और अनेक कार्यक्रम इस बात की पुष्टी करते हैं कि आज अत्याधुनिक 21वीं सदी में भी हम लिंगानुपात के बिगङते आँकङे को सुधार नही पा रहे हैं।
पोलियो, कैंसर, एड्स जैसी बिमारियों को तो मात दे रहे हैं किन्तु बेटीयों के हित में बाधा बनी संकीर्ण सोच को मात नही दे पा रहे हैं। आज भी सम्पन्न एवं सुशिक्षित परिवारों में लङकी होने पर जितनी भी खुशी मनाई जाती हो, लेकिन लङके की ख्वाइश उनके मन से खत्म नही होती। जबकी आज माँ-बाप को कंधे देने का काम बेटी भी कर सकती है, अन्त समय में माँ-पिता के मुँह में वो भी गंगाजल डाल सकती है। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि ऐसा कोई काम नही है जो बेटी नही कर सकती।
वक्त के साथ यदि हम सब अपनी सोच में भी परिवर्तन लांए, बेटी को भी बेटे जैसा अवसर दें तो यकिनन बेटी ही बचाएगी हमारी संस्कृति को एवं आने वाले कल को क्योंकि वे न केवल समाज को शिक्षा देने में सबल है बल्कि देश सम्भालने की भी हिम्मत रखती है। हम सब यदि ये प्रण करें कि लिंग भेद को मिटाकर बेटे को भी ऐसे संस्कार देंगे जिससे वे बहनों का सम्मान करें, दहेज जैसी कुप्रथाओं का अंत करें, बचपन से ही बेटों को नारी के सम्मान और आदर की घुट्टी पिलाएं जिससे बेटीयों के प्रति हो रही विभत्स घटनाओं का अन्त हो सके।
सोचिये! यदि बेटी न होगी तो बहन नही होगी, न माँ, न समाज, न देश होगा, न दुनिया होगी, फिर किस चाँद पर जायेंगे और और कौन सी दुनिया बसाएगें ????
मित्रों, सच तो ये है कि, बेटी है तो कल है, वरना विराना पल है।



