झाबुआ में 'जल जीवन मिशन' का कागजी जलवा: 430 करोड़ खर्च, फिर भी प्यासे हैं ग्रामीण

'Jal Jeevan Mission' in Jhabua: A spectacle only on paper—₹430 crore spent, yet villagers remain thirsty.
झाबुआ। सरकार के महत्वाकांक्षी 'जल जीवन मिशन' का झाबुआ जिले में जो हश्र हुआ है, वह विकास के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। जिले में इस योजना के नाम पर 430 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च कर दी गई है, कागजों में पाइपलाइन बिछ गई है और नल भी लग गए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। 

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 गड्ढों से पानी पीने को मजबूर ग्रामीण
जिले के खेड़ा गांव की तस्वीरें विचलित करने वाली हैं। यहां की महिलाएं तपती दोपहर में करीब 43 डिग्री सेल्सियस तापमान में 1 किलोमीटर पैदल चलकर भामची नदी के सूखे तल तक जाती हैं। वहां रेत में गड्ढे खोदकर वे मटमैला पानी निकालने को मजबूर हैं। गांव वालों का कहना है कि जल जीवन मिशन के तहत चार साल पहले पाइपलाइन बिछाने का काम शुरू हुआ था, जो अब अधूरा और शो-पीस बनकर रह गया है। 

 कागजों में 'पूर्ण', धरातल पर 'शून्य'
पारा पंचायत के बख्तापुरा वार्ड की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। यहां पाइपलाइन बिछी हुई है और घरों के बाहर नल भी लगे हैं, लेकिन इनसे पानी की एक बूंद भी नहीं टपकती। स्थानीय लोगों ने बताया कि सरकारी रिकॉर्ड में यह काम 'पूर्ण' दिखाकर हैंडओवर कर दिया गया है। आलम यह है कि जो नल कभी पानी नहीं दे पाए, उनका उपयोग अब ग्रामीण बकरियों को बांधने के लिए कर रहे हैं। कई परिवारों को पानी के टैंकरों पर अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ रहा है। 

 क्या कहते हैं आंकड़े और जवाबदेही?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जिले के 713 में से 519 गांवों में काम पूरा दिखाया गया है। हालांकि, धरातल पर योजना का कोई लाभ नहीं दिख रहा है। जब इस बारे में अधिकारियों से सवाल किया जाता है, तो भू-जल स्तर गिरने और भीषण गर्मी का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। स्थानीय युवाओं ने शिकायत की है कि उन्होंने अधिकारियों को सात से अधिक पत्र लिखे, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। इसके बावजूद ग्राम पंचायतों द्वारा ग्रामीणों से 'जल कर' वसूला जा रहा है, जो ग्रामीणों के आक्रोश का मुख्य कारण है। 
 कब मिलेगी राहत? 
 50,000 लीटर की क्षमता वाली पानी की टंकियां आज भी धूल फांक रही हैं। बिना बिजली कनेक्शन और अधूरी पाइपलाइन ने इस मिशन की कमर तोड़ दी है। अब सवाल यह उठता है कि क्या करोड़ों के इस घोटाले और प्रशासनिक लापरवाही की जांच होगी? झाबुआ की जनता आज भी उस वादे के सच होने का इंतज़ार कर रही है, जिसके तहत उन्हें घर तक नल का जल मिलना था।
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